लखनऊ/नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) सहित देशभर के उन लाखों-करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए आज का दिन एक बहुत बड़ी और सुकून देने वाली खबर लेकर आया है, जो लंबे समय से 'प्रीपेड स्मार्ट मीटर' (Prepaid Smart Meter) की तानाशाही से परेशान थे। मोबाइल फोन की तरह बिजली के लिए भी पहले पैसे का भुगतान करने (रिचार्ज करने) की जो अनिवार्यता सरकार ने लागू की थी, उसे अब पूरी तरह से वापस ले लिया गया है।Read also:-लखनऊ में 'पोस्टर वॉर' से गरमाई सियासत: अखिलेश यादव को बताया 'रहमान डकैत', आगबबूला सपाइयों ने फाड़े होर्डिंग्स, सड़क पर भारी बवाल!
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केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (Central Electricity Authority - CEA) ने एक नया और ऐतिहासिक आदेश जारी किया है। इस आदेश के तहत अब घरों में स्मार्ट मीटर तो लगाए जाएंगे, लेकिन वे 'प्रीपेड' (Prepaid) होंगे या 'पोस्टपेड' (Postpaid), इसका अंतिम फैसला बिजली विभाग नहीं, बल्कि खुद उपभोक्ता (Consumer) करेगा। 'खबरीलाल' (Khabreelal) की इस खास और विस्तृत रिपोर्ट में आइए समझते हैं कि सरकार के इस बड़े फैसले का आम आदमी की जेब और जिंदगी पर क्या सीधा असर पड़ेगा और यूपी पावर कॉरपोरेशन (UPPCL) के लिए इसके क्या मायने हैं।
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क्या था विवाद और सरकार ने क्या लिया है नया फैसला?

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पिछले कुछ वर्षों से बिजली चोरी रोकने और राजस्व (Revenue) बढ़ाने के उद्देश्य से पूरे देश में पुराने मीटरों को हटाकर उनकी जगह 4G/5G संचार नेटवर्क वाले अत्याधुनिक 'स्मार्ट मीटर' लगाए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग ने एक अलिखित नियम बना दिया था कि जो भी नया कनेक्शन लेगा या जिसके यहाँ स्मार्ट मीटर लगेगा, उसे अनिवार्य रूप से 'प्रीपेड मोड' में ही रखा जाएगा।
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यानी, जब तक आपके मीटर में रिचार्ज बैलेंस है, तब तक आपके घर में रोशनी रहेगी। बैलेंस खत्म होते ही (चाहे आधी रात हो या चिलचिलाती दोपहर) बिना किसी मानवीय दखल के बिजली अपने आप कट जाती थी। इसके कारण पूरे प्रदेश में भारी आक्रोश फैल रहा था।
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लेकिन अब, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने इस पर रोक लगा दी है। नए आदेश के मुताबिक, “जिन क्षेत्रों में संचार नेटवर्क (Communication Network) उपलब्ध है, वहां सभी नए और पुराने बिजली कनेक्शनों पर स्मार्ट मीटर लगाए जाएंगे, लेकिन उन्हें प्रीपेड मोड में ही संचालित करना अब अनिवार्य नहीं रहेगा।” उपभोक्ता अपनी सुविधा, आर्थिक स्थिति और पसंद के अनुसार पोस्टपेड मीटर (महीने के अंत में बिल आने पर भुगतान) का विकल्प खुलकर चुन सकते हैं।
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संसद से सड़क तक हुई लड़ाई: तब जाकर झुका सिस्टम

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प्रीपेड स्मार्ट मीटर की इस जबरदस्ती के खिलाफ उत्तर प्रदेश में एक लंबी लड़ाई लड़ी गई। 'राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद' (Rajya Vidyut Upbhokta Parishad) ने इस मुद्दे को लेकर लगातार धरना-प्रदर्शन किया और नियामक आयोग (UPERC) से लेकर केंद्र सरकार तक उपभोक्ताओं की आवाज पहुंचाई।
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इस आंदोलन को तब एक बड़ी सफलता मिली, जब हाल ही में संसद सत्र के दौरान यह मुद्दा जोर-शोर से गूंजा। संसद में उठे सवालों का सीधा और स्पष्ट जवाब देते हुए देश के केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर (Union Power Minister Manohar Lal Khattar) ने साफ शब्दों में कहा था कि, "प्रीपेड मीटर लगाना किसी भी रूप में अनिवार्य नहीं है। यह पूरी तरह से उपभोक्ताओं की इच्छा पर निर्भर करता है कि वे कौन सा विकल्प चुनते हैं।" ऊर्जा मंत्री के इस बयान के बाद ही CEA ने अपने पुराने नियमों में संशोधन की प्रक्रिया तेज कर दी थी।
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कानूनी पहलू: विद्युत अधिनियम 2003 में हुआ अहम संशोधन

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इस फैसले को कानूनी जामा पहनाने के लिए केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने 'विद्युत अधिनियम 2003' (Electricity Act 2003) की धारा 47(5) के तहत पूर्व में दिए गए अपने ही आदेश में बड़ा संशोधन किया है। पुराने नियम के तहत बिजली वितरण कंपनियों (Discoms) को यह अधिकार मिल गया था कि वे एडवांस भुगतान के लिए उपभोक्ताओं पर दबाव बना सकती थीं। लेकिन नए संशोधन ने इस ताकत को खत्म कर दिया है और गेंद वापस उपभोक्ता के पाले में डाल दी है। अब कोई भी बिजली अधिकारी या लाइनमैन किसी भी उपभोक्ता को बिना उसकी मर्जी के प्रीपेड मीटर लगवाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
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यूपी के 70 लाख उपभोक्ताओं का क्या होगा? समझिए गणित

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अगर उत्तर प्रदेश (UP) की बात करें, तो यहां की स्थिति बेहद दिलचस्प है। उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन (UPPCL) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश भर में अब तक 78 लाख से अधिक स्मार्ट मीटर सफलतापूर्वक इंस्टॉल किए जा चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि इन 78 लाख में से लगभग 70 लाख स्मार्ट मीटरों को जबरन या बिना उचित विकल्प दिए 'प्रीपेड मोड' पर सेट कर दिया गया था।
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अब सवाल उठता है कि इन 70 लाख लोगों का क्या होगा?

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तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि स्मार्ट मीटर की खासियत ही यही है कि उन्हें कंट्रोल रूम (Backend) से एक क्लिक के जरिए 'प्रीपेड' से 'पोस्टपेड' या 'पोस्टपेड' से 'प्रीपेड' में बदला जा सकता है। इसके लिए मीटर बदलने की जरूरत नहीं होती, सिर्फ सॉफ्टवेयर में बदलाव करना होता है। उपभोक्ता परिषद अब यह मांग कर रहा है कि जिन 70 लाख उपभोक्ताओं के मीटर जबरन प्रीपेड किए गए थे, बिजली विभाग उनसे सहमति पत्र ले और जो लोग पोस्टपेड में वापस जाना चाहते हैं, उनके मीटरों को तुरंत पोस्टपेड मोड में बदला जाए।
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स्मार्ट मीटर का खौफ: आखिर क्यों आम जनता कर रही थी प्रीपेड का विरोध?

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सरकार के इस फैसले से जो खुशी आम जनता में देखी जा रही है, उसके पीछे उनका वह दर्द है जो उन्होंने पिछले कुछ महीनों में झेला है:
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    रात-बिरात बिजली कटना: प्रीपेड मीटर में बैलेंस जीरो होते ही बिजली तुरंत कट जाती थी। कई बार सर्वर डाउन होने के कारण रात के 2 बजे अगर बिजली कटी, तो सुबह तक उपभोक्ता को अंधेरे में रहना पड़ता था।
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    तकनीकी गड़बड़ियां: कई बार उपभोक्ता ऑनलाइन रिचार्ज कर देते थे, बैंक से पैसा भी कट जाता था, लेकिन सिस्टम में अपडेट न होने के कारण मीटर चालू नहीं होता था। लोग टोल-फ्री नंबरों पर फोन करते-करते थक जाते थे।
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    मीटर तेज चलने की शिकायतें: आम जनता का सबसे बड़ा आरोप यह था कि पुराने मीटरों के मुकाबले स्मार्ट मीटर 20 से 30 प्रतिशत ज्यादा तेज भाग रहे हैं। प्रीपेड होने के कारण लोग यह समझ ही नहीं पाते थे कि उनका पैसा इतनी जल्दी कहाँ उड़ जा रहा है।
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    आर्थिक दबाव: गरीब, किसान और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए महीने में अचानक से 2-3 हजार रुपये का रिचार्ज करना संभव नहीं होता। पोस्टपेड में उन्हें पैसे का जुगाड़ करने के लिए 15 से 20 दिन का अतिरिक्त समय मिल जाता था।
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उपभोक्ता परिषद ने जताई खुशी: "यह आम आदमी की जीत है"

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इस फैसले के आधिकारिक तौर पर जारी होने के बाद, राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने भारी खुशी व्यक्त की है। उन्होंने कहा, "देशभर के और विशेषकर उत्तर प्रदेश के विद्युत उपभोक्ताओं ने एक बहुत ही लंबी और कठिन लड़ाई के बाद यह ऐतिहासिक जीत हासिल की है। बिजली विभाग ने अपनी मनमानी करते हुए लाखों उपभोक्ताओं को परेशान किया था। अब नया कानून आ गया है, कोई भी उपभोक्ता बिना अपनी मर्जी के प्रीपेड मीटर लगवाने को मजबूर नहीं होगा। हम ऊर्जा मंत्री और केंद्र सरकार के इस जनहितैषी फैसले का स्वागत करते हैं।"
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भविष्य की राह और बिजली विभाग की चुनौती

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सरकार का यह फैसला लोकतंत्र में उपभोक्ता अधिकारों की एक बड़ी जीत है। इससे जहां एक तरफ लाखों लोगों को मानसिक और आर्थिक राहत मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन (UPPCL) के सामने बिल वसूली (Revenue Collection) की पुरानी चुनौती फिर से खड़ी हो जाएगी।
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बिजली विभाग को अब स्मार्ट मीटर के तकनीकी फायदों (जैसे सटीक रीडिंग, ऊर्जा की बचत) के बारे में जनता को जागरूक करना होगा, न कि डंडे के जोर पर उन्हें प्रीपेड प्रणाली में धकेलना होगा। यदि विभाग बेहतरीन सेवाएं और बिना किसी रुकावट के बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करता है, तो भविष्य में उपभोक्ता स्वयं अपनी मर्जी से प्रीपेड की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
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