भारत की न्याय प्रणाली में अक्सर 'तारीख पे तारीख' मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है, जो अदालतों में मुकदमों के लंबे समय तक लंबित रहने की पीड़ा को दर्शाता है। लेकिन वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) के सबसे सशक्त माध्यम यानी 'लोक अदालतों' ने इस तस्वीर को बदलने का बीड़ा उठाया है। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद से न्यायिक क्षेत्र की एक बेहद सकारात्मक और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। शनिवार को जनपद न्यायालय परिसर में आयोजित बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत ने अपने पिछले सभी पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं।READ ALSO:-मेरठ में महिला का सुसाइड वीडियो: विक्टोरिया पार्क के पास जहर खाकर पति आदेश शर्मा और भाई पर लगाए गंभीर आरोप, अस्पताल में हालत नाजुक
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जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (District Legal Services Authority - DLSA) के तत्वावधान में आयोजित इस मेगा लोक अदालत में एक ही दिन में कुल 70,991 मामलों का सफलतापूर्वक निस्तारण किया गया है। मुकदमों के बोझ तले दबी न्यायपालिका के लिए यह आंकड़ा किसी संजीवनी से कम नहीं है। इस ऐतिहासिक आयोजन में न केवल वादों का निपटारा हुआ, बल्कि 7 लाख 50 हजार रुपये जुर्माने के रूप में सरकारी खजाने में जमा कराए गए। इसके अलावा, विभिन्न सुलह-समझौता मामलों में पक्ष-विपक्ष के बीच आपसी सहमति से लगभग 10 करोड़ 50 लाख रुपये की धनराशि का सेटलमेंट (Settlement) कराया गया। इस विस्तृत समाचार रिपोर्ट में हम इस ऐतिहासिक बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत की सफलता, इसमें शामिल न्यायाधीशों के योगदान और आम जनता को मिलने वाले सस्ते और सुलभ न्याय की अवधारणा पर गहराई से चर्चा करेंगे। (Internal link to related article: भारत में लंबित मुकदमों की समस्या और फास्ट ट्रैक अदालतों की भूमिका)
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बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत: जिला न्यायाधीश संजय कुमार का कुशल नेतृत्व

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किसी भी बड़े आयोजन की सफलता उसके नेतृत्वकर्ता की कार्यकुशलता पर निर्भर करती है। शनिवार को आयोजित इस बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत का शुभारंभ और संचालन जनपद न्यायाधीश (District Judge) एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष श्री संजय कुमार की गरिमामयी अध्यक्षता में हुआ।
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अध्यक्षता और दिशा-निर्देश: जनपद न्यायाधीश संजय कुमार ने इस राष्ट्रीय लोक अदालत को सफल बनाने के लिए पिछले कई हफ्तों से तैयारियां शुरू कर दी थीं। उनके कुशल नेतृत्व में सभी न्यायिक अधिकारियों, मजिस्ट्रेटों, पुलिस प्रशासन, बैंक अधिकारियों, बीमा कंपनियों और अधिवक्ता संघ (Bar Association) के बीच बेहतरीन समन्वय स्थापित किया गया। जिला न्यायाधीश ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि अधिक से अधिक ऐसे मामलों को चिन्हित किया जाए जिनमें दोनों पक्ष आपसी सुलह के लिए तैयार हों।
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उनके इस विजन का ही परिणाम था कि शनिवार सुबह से ही जनपद न्यायालय परिसर, बिजनौर में वादकारियों (Litigants) की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। लोगों में अपने पुराने मुकदमों को खत्म करने का उत्साह साफ देखा जा सकता था। न्यायाधीश संजय कुमार ने खुद विभिन्न बेंचों का निरीक्षण किया और वादकारियों को आपसी सुलह-समझौते के माध्यम से विवादों को खत्म कर शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए प्रेरित किया।
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10 करोड़ 50 लाख रुपये का ऐतिहासिक समझौता: एक आर्थिक और सामाजिक जीत

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अदालती मुकदमों में सबसे बड़ी समस्या समय और धन की बर्बादी होती है। जब दो पक्षों के बीच सालों तक मुकदमा चलता है, तो वकीलों की फीस और पेशियों पर आने-जाने में भारी आर्थिक नुकसान होता है। बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत ने इस आर्थिक नुकसान पर एक बड़ा ब्रेक लगाया है।
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इस लोक अदालत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह रही कि विभिन्न दीवानी (Civil), राजस्व (Revenue), और पारिवारिक मामलों में दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठाकर, मध्यस्थों (Mediators) की मदद से लगभग 10 करोड़ 50 लाख रुपये (₹10.5 Crore) की विशाल धनराशि का समझौता कराया गया। यह कोई छोटी रकम नहीं है। जब इतनी बड़ी राशि विवादों से निकलकर लोगों के हाथों में पहुंचती है, तो इससे सीधे तौर पर स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती है।
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जुर्माने की वसूली: समझौतों के अलावा, यातायात चालान (Traffic Challans), नगर पालिका के चालान और अन्य छोटे आपराधिक मामलों (Petty Offences) में भी त्वरित कार्रवाई की गई। इन मामलों को निपटाते हुए अदालत ने 7 लाख 50 हजार रुपये (₹7,50,000) का जुर्माना भी वसूल किया, जो सीधे तौर पर सरकारी राजस्व में वृद्धि करता है।
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मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT): पीड़ित परिवारों को मिली लाखों की राहत

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सड़क दुर्घटनाएं किसी भी परिवार को भावनात्मक और आर्थिक रूप से पूरी तरह तोड़ देती हैं। दुर्घटना में अपनों को खोने या गंभीर रूप से घायल होने के बाद मुआवजे (Compensation) के लिए बीमा कंपनियों के चक्कर लगाना पीड़ितों के लिए एक और बड़ा आघात होता है। बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत में ऐसे मामलों को विशेष प्राथमिकता दी गई।
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मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (Motor Accident Claims Tribunal - MACT) के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष बेंच का गठन किया गया था। इस बेंच की कमान न्यायाधीश ज्ञान प्रकाश सिंह के हाथों में थी।
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न्यायाधीश ज्ञान प्रकाश सिंह का अहम योगदान: न्यायाधीश ज्ञान प्रकाश सिंह ने अत्यंत संवेदनशीलता और तत्परता दिखाते हुए बीमा कंपनियों के अधिकारियों और पीड़ित पक्ष के अधिवक्ताओं के साथ मिलकर 26 जटिल मामलों का एक ही दिन में निस्तारण किया। इन 26 दुर्घटना दावा मुकदमों में पीड़ित परिवारों को आपसी सुलह के आधार पर लगभग 23 लाख रुपये (₹23 Lakh) का क्लेम (मुआवजा) दिलाया गया।
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सालों से मुआवजे का इंतजार कर रहे कई परिवारों की आंखों में यह राहत की राशि पाकर आंसू आ गए। लोक अदालत का यह मानवीय चेहरा यह साबित करता है कि कानून केवल सजा देने के लिए नहीं है, बल्कि पीड़ितों के आंसू पोंछने के लिए भी है। 
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अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों का शानदार प्रदर्शन और करोड़ों का जुर्माना

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70,991 मुकदमों का एक दिन में निपटना किसी चमत्कार से कम नहीं लगता, लेकिन इसके पीछे बिजनौर के न्यायिक मजिस्ट्रेटों और उनके स्टाफ की दिन-रात की कड़ी मेहनत शामिल है। जनपद न्यायाधीश के मार्गदर्शन में कई अन्य मजिस्ट्रेटों ने अपनी-अपनी अदालतों में लंबित मामलों को रिकॉर्ड गति से निपटाया।
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प्रमुख मजिस्ट्रेट और उनकी भूमिका: माननीय न्यायाधीश मजिस्ट्रेट नरेंद्र कुमार, नैंसी धुनिया, अंशुमान धुनिया, सुंदरलाल तथा किरण बाला ने इस राष्ट्रीय अभियान में संयुक्त रूप से अतुलनीय योगदान दिया।
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    इन मजिस्ट्रेटों ने अपनी अलग-अलग बेंचों में बैठकर शमनीय दांडिक अपराधों (Compoundable Criminal Offences), निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 (Cheque Bounce Cases), बैंक रिकवरी वादों, और श्रम विवादों (Labour Disputes) की लगातार सुनवाई की।
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    इन सभी मजिस्ट्रेटों के संयुक्त प्रयासों से अलग-अलग मामलों में करोड़ों रुपये के सेटलमेंट और जुर्माने सुनिश्चित किए गए।
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    चेक बाउंस और बैंक लोन से जुड़े मामलों में बकाएदारों (Defaulters) और बैंक प्रबंधकों के बीच बीच का रास्ता निकालकर मुकदमों को खत्म किया गया, जिससे बैंकों की 'नॉन परफॉर्मिंग एसेट' (NPA) में कमी आई और बकाएदारों को कानूनी पचड़ों से मुक्ति मिली।
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बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत का मुख्य उद्देश्य: सस्ता और सुलभ न्याय

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इस वृहद आयोजन के समापन पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के अधिकारियों ने प्रेस को संबोधित करते हुए बताया कि बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत का एकमात्र और मुख्य उद्देश्य समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को "सस्ता और सुलभ न्याय" (Cheap and Accessible Justice) उपलब्ध कराना है।
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लोक अदालत की अवधारणा (Concept of Lok Adalat): 'लोक अदालत' का शाब्दिक अर्थ है 'लोगों की अदालत'। यह भारतीय न्याय व्यवस्था का एक अभिनव प्रयोग है, जो प्राचीन भारत की पंचायती न्याय व्यवस्था से प्रेरित है। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987) के तहत लोक अदालतों को वैधानिक दर्जा (Statutory Status) प्राप्त है।
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लोक अदालत का सबसे बड़ा फायदा यह है कि:

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    कोई कोर्ट फीस नहीं: लोक अदालत में मुकदमा लड़ने या समझौता करने के लिए कोई अतिरिक्त कोर्ट फीस नहीं देनी पड़ती है। यदि अदालत में पहले से कोई मुकदमा लंबित है और वह लोक अदालत में सुलझ जाता है, तो पहले जमा की गई कोर्ट फीस भी नियमानुसार वापस कर दी जाती है।
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    अंतिम फैसला: लोक अदालत द्वारा दिया गया फैसला अंतिम (Final) होता है और सभी पक्षों पर बाध्यकारी (Binding) होता है। इसके फैसले के खिलाफ किसी भी ऊपरी अदालत में अपील नहीं की जा सकती है, जिससे मुकदमों का सिलसिला हमेशा के लिए वहीं खत्म हो जाता है।
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    समय की बचत: सालों-साल चलने वाले मुकदमों का फैसला चंद मिनटों या घंटों की आपसी बातचीत से हो जाता है।
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किन मामलों का होता है लोक अदालत में निपटारा?

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आम जनता के मन में अक्सर यह सवाल रहता है कि बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत जैसे आयोजनों में किस प्रकार के मुकदमे सुलझाए जाते हैं। लोक अदालत मुख्य रूप से उन मामलों को हाथ में लेती है जिनमें दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार हों (Compoundable cases)। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
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    पारिवारिक और वैवाहिक विवाद (Matrimonial Disputes): पति-पत्नी के बीच के विवाद, भरण-पोषण (Alimony) के मामले और तलाक के ऐसे मामले जिनमें सुलह की गुंजाइश हो।
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    बैंक रिकवरी (Bank Recovery): बैंकों के लोन न चुका पाने के मामले, जहां बैंक और ग्राहक एकमुश्त समाधान (One Time Settlement - OTS) पर सहमत हो जाते हैं।
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    बिजली और पानी के बिल विवाद: बिजली विभाग और उपभोक्ताओं के बीच बिलों की गड़बड़ी या चोरी के शमनीय मामले।
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    भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition): जमीन के अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े विवाद।
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    चेक बाउंस (Section 138 NI Act): पैसों के लेन-देन में चेक बाउंस होने के मामले।
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    मोटर दुर्घटना दावे (MACT): सड़क दुर्घटनाओं में मुआवजे के दावे।
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उत्तर प्रदेश न्यायपालिका और मुकदमों का बढ़ता बोझ

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उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है, और स्वाभाविक रूप से यहां की अदालतों में मुकदमों का बोझ भी सबसे अधिक है। इलाहाबाद हाई कोर्ट से लेकर जिला और सत्र न्यायालयों तक लाखों मामले वर्षों से लंबित हैं। इन लंबित मुकदमों (Pending Cases) के कारण न्याय मिलने में देरी होती है।
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इस परिदृश्य में बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत द्वारा एक ही दिन में लगभग 71 हजार मामलों का निपटारा किया जाना पूरे उत्तर प्रदेश की न्यायपालिका के लिए एक 'केस स्टडी' (Case Study) है। जब इतने भारी संख्या में छोटे और शमनीय विवाद न्यायपालिका की मुख्य धारा से बाहर निकल जाते हैं, तो न्यायाधीशों को उन गंभीर आपराधिक और दीवानी मामलों (जैसे हत्या, डकैती, बलात्कार) की सुनवाई के लिए अधिक समय मिल पाता है, जिन्हें लोक अदालत में नहीं सुलझाया जा सकता।
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वादकारियों (Litigants) के लिए मानसिक शांति का दिन

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न्यायालय परिसर में मौजूद वादकारियों के चेहरे पर लोक अदालत के दिन एक अलग ही राहत नजर आती है। जो व्यक्ति सालों से कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहा होता है, उसके लिए वह दिन किसी उत्सव से कम नहीं होता जब जज साहब दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर राजीनामा (Compromise) लिखवा देते हैं।
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बिजनौर के एक ग्रामीण ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "मेरा अपनी जमीन की मेड़ को लेकर भाई से पिछले 8 साल से विवाद चल रहा था। वकीलों को फीस दे-देकर हम दोनों आर्थिक रूप से टूट चुके थे। आज लोक अदालत में जज साहब और वकीलों ने हमें आमने-सामने बैठाकर समझाया। कुछ मैंने अपनी जिद छोड़ी, कुछ उसने। आज हमारा फैसला हो गया। अब मैं चैन की नींद सो सकूंगा।" यही वह मानसिक शांति (Peace of Mind) है जो बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत अपने नागरिकों को प्रदान कर रही है। जब विवाद खत्म होता है, तो समाज में आपसी भाईचारा और सौहार्द भी बढ़ता है।
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वकीलों (अधिवक्ताओं) की सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका

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अक्सर यह भ्रांति होती है कि वकील मुकदमों को लंबा खींचना चाहते हैं, लेकिन राष्ट्रीय लोक अदालतों की सफलता बिना अधिवक्ता संघ (Bar Association) के पूर्ण सहयोग के संभव नहीं है।
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बिजनौर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और अन्य वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इस आयोजन में बेहद सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका निभाई। उन्होंने अपने मुवक्किलों (Clients) को लोक अदालत के फायदों के बारे में जागरूक किया और उन्हें अपनी 'ईगो' (अहंकार) छोड़कर समझौते की मेज पर आने के लिए राजी किया। वकीलों ने मध्यस्थ (Mediators) के रूप में कार्य करते हुए जटिल कानूनी दांव-पेंचों को दरकिनार कर मानवता और व्यवहारिकता के आधार पर मुकदमों को सुलझाने में जिला जज और मजिस्ट्रेटों का पूरा साथ दिया।
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भविष्य की राह: न्याय प्रणाली को और कैसे सुदृढ़ किया जाए?

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बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत की इस शानदार सफलता ने भविष्य के लिए भी कई दरवाजे खोले हैं। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (UPSLSA) लगातार ऐसे प्रयास कर रहे हैं कि लोक अदालतों को और अधिक तकनीकी रूप से उन्नत (Digitally Advanced) बनाया जाए।
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ई-लोक अदालत (E-Lok Adalat): कोविड-19 महामारी के बाद से 'ई-लोक अदालतों' का चलन भी बढ़ा है। भविष्य में बिजनौर प्रशासन डिजिटल माध्यमों का उपयोग करके उन लोगों को भी लोक अदालत की सुविधा प्रदान कर सकता है जो शारीरिक रूप से न्यायालय परिसर में आने में असमर्थ हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए समझौते कराना समय की मांग है।
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कानूनी साक्षरता (Legal Literacy): इसके साथ ही, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ग्रामीण इलाकों में साक्षरता शिविर (Legal Literacy Camps) आयोजित कर रहा है ताकि गांव के सीधे-सादे लोगों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा सके और उन्हें छोटे-मोटे विवादों को अदालत तक ले जाने के बजाय पंचायत या 'प्री-लिटिगेशन' (Pre-litigation) स्तर पर ही निपटाने की सलाह दी जा सके।
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अंत में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जनपद न्यायालय बिजनौर में आयोजित बिजनौर राष्ट्रीय लोक अदालत ने न्याय के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। जनपद न्यायाधीश संजय कुमार के नेतृत्व, मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के न्यायाधीश ज्ञान प्रकाश सिंह की तत्परता और मजिस्ट्रेटों (नरेंद्र कुमार, नैंसी धुनिया, अंशुमान धुनिया, सुंदरलाल, किरण बाला) की अथक मेहनत ने 70,991 वादों का निस्तारण कर आम जनता को एक बड़ी राहत दी है।
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7.5 लाख रुपये का जुर्माना वसूलना और 10.5 करोड़ रुपये का सेटलमेंट कराना इस आयोजन की वित्तीय सफलता को भी दर्शाता है। यह लोक अदालत इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि जब न्यायपालिका, प्रशासन और आम जनता एक सकारात्मक सोच के साथ एक मंच पर आते हैं, तो बड़े से बड़ा विवाद भी आपसी सहमति से सुलझाया जा सकता है। यह आयोजन महात्मा गांधी के उस सपने को साकार करता है जिसमें उन्होंने कहा था कि "असली न्याय वह है जो सस्ता हो, सुलभ हो और जिसमें किसी की हार न हो, बल्कि दोनों पक्षों की जीत हो।" बिजनौर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने इस लोक अदालत के जरिए न्याय की एक शानदार मिसाल पूरे देश के सामने पेश की है।
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उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद न्यायालय में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के तत्वावधान में आयोजित 'राष्ट्रीय लोक अदालत' ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। जिला न्यायाधीश संजय कुमार की अध्यक्षता में एक ही दिन में 70,991 मुकदमों का ऐतिहासिक निस्तारण किया गया। अदालत ने 7.5 लाख रुपये जुर्माने के रूप में वसूले और विभिन्न मामलों में पक्ष-विपक्ष के बीच 10.5 करोड़ रुपये का समझौता कराया। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के न्यायाधीश ज्ञान प्रकाश सिंह ने 26 मामलों में पीड़ितों को 23 लाख रुपये का क्लेम दिलाया। इसके अतिरिक्त, मजिस्ट्रेट नरेंद्र कुमार, नैंसी धुनिया, अंशुमान धुनिया सहित अन्य न्यायाधीशों ने करोड़ों रुपये के विवाद निपटाए। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य आम जनता को सस्ता, सुलभ और त्वरित न्याय उपलब्ध कराना रहा, जिससे जिले के हजारों लोगों को मुकदमों के बोझ से मुक्ति मिली।
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