उत्तर प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था (Health System) में आने वाले समय में एक क्रांतिकारी और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिलने वाला है। अब तक आप जिन आयुर्वेदिक डॉक्टरों के पास नाड़ी दिखाने और जड़ी-बूटियों की दवा लेने जाते थे, वे साल 2026 से ऑपरेशन थिएटर में सर्जरी करते हुए भी नजर आएंगे।READ ALSO:-VinFast V-Green और HPCL ने मिलाया हाथ, देशभर के फ्यूल स्टेशनों पर स्थापित होंगे हाई-टेक EV चार्जिंग स्टेशन; इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को मिलेगी नई रफ्तार
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प्रदेश के सरकारी अस्पतालों, विशेषकर एलोपैथी सेंटर्स पर मरीजों के बढ़ते दबाव और लंबी कतारों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद (CCIM) की पहल और आयुष विभाग की तैयारियों के मुताबिक, आयुर्वेदिक डॉक्टरों को छोटे-मोटे ऑपरेशन और कुछ विशेष शल्य चिकित्सा (Surgery) की अनुमति देने की तैयारी अंतिम चरण में है। हालांकि, मॉडर्न मेडिसिन के डॉक्टर और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) इस फैसले को 'मिक्सोपैथी' (Mixopathy) का नाम देकर इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं।
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आइये, इस विस्तृत रिपोर्ट में समझते हैं कि सरकार का यह प्लान क्या है, आयुर्वेदिक डॉक्टर कौन-कौन से ऑपरेशन कर सकेंगे और आम जनता को इससे कितना फायदा या नुकसान होगा।
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1. मिशन 2026: क्यों पड़ी इस बदलाव की जरूरत?

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उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी और मरीजों की भारी भीड़ हमेशा से एक चुनौती रही है। जिला अस्पतालों से लेकर मेडिकल कॉलेजों तक, छोटी-छोटी सर्जरी के लिए मरीजों को महीनों इंतजार करना पड़ता है।
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भीड़ कम करने का मास्टरप्लान: सरकार का मानना है कि एलोपैथी अस्पतालों में छोटे-मोटे ऑपरेशंस के लिए लंबी वेटिंग लिस्ट होती है। अगर आयुर्वेदिक डॉक्टर (जिन्होंने सर्जरी में पीजी किया है) इन कार्यों को संभाल लेंगे, तो एमबीबीएस और एमएस (MBBS/MS) डॉक्टरों पर बोझ कम होगा और वे गंभीर रोगों पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
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किन छात्रों को मिलेगी अनुमति? यह अनुमति हर बीएएमएस (BAMS) डॉक्टर को नहीं मिलेगी। भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद (CCIM) ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश के बीएचयू (BHU), राजकीय एवं निजी आयुर्वेद कॉलेजों में सर्जरी (शल्य तंत्र) में परास्नातक (Post Graduation) की पढ़ाई करने वाले छात्रों को ही सर्जरी की अनुमति दी जाएगी। यानी जो आयुर्वेद में एमएस (MS Ayurveda) करेंगे, वे ही 'सर्जन' कहलाने के हकदार होंगे।
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2. कौन-कौन सी सर्जरी कर सकेंगे आयुर्वेदिक डॉक्टर?

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आम जनता के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब हार्ट और ब्रेन सर्जरी भी आयुर्वेदिक डॉक्टर करेंगे? इसका जवाब है- 'नहीं'। सरकार ने फिलहाल 'जनरल सर्जरी' और 'माइनर सर्जरी' की एक सूची तैयार की है।
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साल 2026 से आयुर्वेदिक डॉक्टरों को मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रक्रियाओं की अनुमति मिलेगी:

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    टांके लगाना (Suturing): दुर्घटना या चोट लगने पर घावों को सिलना।
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    बवासीर और भगंदर (Piles & Fistula): आयुर्वेद में 'क्षार-सूत्र' विधि पहले से ही इन रोगों के लिए प्रसिद्ध है, अब इसे आधिकारिक रूप से एलोपैथी सेटअप में जगह मिलेगी।
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    फोड़ा-फुंसी का चीरा: स्किन से जुड़ी माइनर सर्जरी।
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    ENT सर्जरी: नाक, कान और गले से जुड़ी सामान्य सर्जरी।
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    हड्डी रोग: सामान्य फ्रैक्चर में प्लास्टर चढ़ाना या उतारना।
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    आंख: मोतियाबिंद जैसी कुछ सामान्य प्रक्रियाओं पर भी विचार हो रहा है (गाइडलाइन का इंतजार)।
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3. 'ब्रिज कोर्स': 6 महीने की एलोपैथी ट्रेनिंग होगी अनिवार्य

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आयुर्वेद में सर्जरी (शल्य चिकित्सा) का इतिहास सुश्रुत संहिता से जुड़ा है, लेकिन मॉडर्न ऑपरेशन थिएटर के प्रोटोकॉल अलग होते हैं। इसलिए, सुरक्षा के लिहाज से एक विशेष प्रावधान किया गया है।
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नई गाइडलाइन के मुख्य बिंदु:

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    6 माह का प्रशिक्षण: आयुर्वेद में सर्जरी की डिग्री रखने वाले डॉक्टरों को सीधे ऑपरेशन थिएटर में नहीं भेजा जाएगा। उन्हें पहले 6 महीने तक एलोपैथी चिकित्सालयों (District Hospitals/Medical Colleges) में विशेष प्रशिक्षण लेना होगा।
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    क्या सिखाया जाएगा? इस ट्रेनिंग के दौरान उन्हें मॉडर्न एनेस्थीसिया (Anesthesia) देने के तरीके, आपातकालीन स्थिति (Emergency Management) को संभालना, स्टरलाइजेशन (Sterilization) और एलोपैथी सर्जरी के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में व्यावहारिक ज्ञान दिया जाएगा।
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    उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि यदि ऑपरेशन के दौरान कोई जटिलता (Complication) आए, तो आयुर्वेदिक डॉक्टर उसे मॉडर्न तरीके से भी संभाल सकें।
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4. सरकार का पक्ष: "आयुर्वेद पर जनता का अटूट विश्वास"

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इस पूरी कवायद को लेकर आयुष विभाग बेहद सकारात्मक है। आयुष विभाग के प्रमुख सचिव रंजन कुमार ने इस योजना की पुष्टि करते हुए बताया कि सरकार नए सिरे से नियमावली तैयार करवा रही है।
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प्रमुख सचिव का बयान:

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"आयुर्वेद के ऊपर लोगों का विश्वास सदियों से रहा है। आज के समय में भी लोग आयुर्वेद पर अधिक भरोसा करते हैं क्योंकि यह एक ऐसी विधा है, जिसके दावों और दवाओं का शरीर के दूसरे अंगों पर दुष्प्रभाव (Side Effects) न के बराबर होता है। सर्जरी की अनुमति मिलने से मरीजों को बड़ा फायदा होगा। हम आयुर्वेद अस्पतालों में इसके लिए पर्याप्त संसाधन (Resources) उपलब्ध कराएंगे।"
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उन्होंने यह भी बताया कि अन्य राज्यों में जहाँ यह व्यवस्था आंशिक रूप से लागू है, वहाँ का भी आकलन किया जा रहा है। कैबिनेट की मंजूरी मिलते ही 2026 से इसे धरातल पर उतार दिया जाएगा।
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5. विवाद: IMA का विरोध और 'मिक्सोपैथी' का डर

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जहाँ सरकार इसे स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के रूप में देख रही है, वहीं मॉडर्न मेडिसिन के डॉक्टरों का संगठन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) इसका कड़ा विरोध कर रहा है।
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विरोध के कारण:

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    मिक्सोपैथी (Mixopathy): IMA का कहना है कि दो अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियों को मिलाना खतरनाक है। आयुर्वेद और एलोपैथी के सिद्धांत (Principles) एकदम अलग हैं।
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    रोगी सुरक्षा: एलोपैथी डॉक्टरों का तर्क है कि मॉडर्न सर्जरी के लिए एनेस्थीसिया और एंटीबायोटिक्स की गहरी समझ जरूरी है, जो आयुर्वेद के पाठ्यक्रम का मुख्य हिस्सा नहीं है। 6 महीने की ट्रेनिंग एमबीबीएस और एमएस की सालों की पढ़ाई की बराबरी नहीं कर सकती।
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    पहचान का संकट: उनका कहना है कि इससे मरीजों में भ्रम पैदा होगा कि वे किस डॉक्टर (आयुर्वेदिक या एलोपैथिक) से इलाज करा रहे हैं।
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बावजूद इसके, सरकार अपने फैसले पर अडिग नजर आ रही है और इसे 'इंटीग्रेटेड हेल्थ सिस्टम' (Integrated Health System) की दिशा में एक कदम मान रही है।
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6. बदलती तस्वीर: कोरोना काल के बाद बढ़ा आयुर्वेद का कद

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कोविड-19 महामारी के दौरान जब एलोपैथी की सीमाएं नजर आईं, तब आयुर्वेद ने 'इम्युनिटी बूस्टर' के रूप में अपनी ताकत दिखाई।
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    एलोपैथी डॉक्टरों का बदला नजरिया: कोरोना काल में मिले लाभ के कारण अब कई एलोपैथिक चिकित्सक भी आयुर्वेद को स्वीकार कर रहे हैं। लिवर संबंधी बीमारियों, पाचन तंत्र और इम्युनिटी बढ़ाने के लिए अब एमबीबीएस डॉक्टर भी आयुर्वेदिक सप्लीमेंट्स (Ayurvedic Supplements) लिख रहे हैं।
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    सहभागिता: हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) पर अब एक एलोपैथ और एक आयुर्वेद चिकित्साधिकारी (सामुदायिक स्वास्थ्य) की नियुक्ति होती है। ये दोनों मिलकर राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों को सफल बना रहे हैं।7. एकीकरण (Integration):
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भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था

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केंद्र और राज्य सरकार अब "वन नेशन, वन हेल्थ सिस्टम" की तर्ज पर चिकित्सा पद्धतियों के एकीकरण पर जोर दे रही है।
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    कॉम्बो ट्रीटमेंट: अब सिर्फ एक प्रणाली पर निर्भर रहने के बजाय डायबिटीज (Diabetes), हृदय रोग (Heart Disease) और मोटापे (Obesity) जैसी लाइफस्टाइल बीमारियों में आयुर्वेद और एलोपैथी दोनों के लाभों को मिलाकर इलाज का प्रोटोकॉल तैयार किया जा रहा है।
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    दवा लिखने की छूट: याद दिला दें कि वर्ष 2016 में ही एक बड़ा फैसला लिया गया था, जिसके तहत आयुर्वेदिक डॉक्टरों को आपातकालीन स्थिति में या जहाँ एलोपैथी डॉक्टर नहीं हैं, वहां एलोपैथी दवाएं लिखने की अनुमति दी गई थी। अब सर्जरी की अनुमति इस कड़ी में अगला बड़ा कदम है।
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8. क्या होगा आम आदमी पर असर? (Impact Analysis)

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इस फैसले के लागू होने से आम जनता को मिले-जुले परिणाम देखने को मिल सकते हैं:
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    फायदा (Pros):
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      गांवों और छोटे कस्बों में जहाँ सर्जन (MS) उपलब्ध नहीं हैं, वहां आयुर्वेदिक सर्जन लोगों की जान बचा सकेंगे।
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      छोटे ऑपरेशन के लिए बड़े शहरों की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी।
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      सरकारी अस्पतालों में भीड़ कम होगी और इलाज सस्ता सुलभ होगा।
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    चुनौती (Cons):
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      गुणवत्ता (Quality) को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
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      अगर सर्जरी बिगड़ी, तो जिम्मेदारी किसकी होगी—यह तय करना एक कानूनी चुनौती होगी।
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      एलोपैथी दवाओं (एंटीबायोटिक्स/पेनकिलर्स) के अत्यधिक उपयोग का खतरा बढ़ सकता है।
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सुश्रुत की विरासत की वापसी या जोखिम?

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महर्षि सुश्रुत को दुनिया का 'पहला सर्जन' माना जाता है। ऐसे में आयुर्वेद में सर्जरी कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह अपनी जड़ों की ओर लौटना है। लेकिन चुनौती यह है कि आज के आधुनिक उपकरणों और संक्रमण नियंत्रण (Infection Control) के मानकों के साथ प्राचीन ज्ञान का तालमेल कैसे बैठाया जाएगा।
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2026 में लागू होने वाली यह व्यवस्था अगर सही ट्रेनिंग और सख्त निगरानी (Monitoring) के साथ शुरू होती है, तो यह यूपी की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए 'संजीवनी' साबित हो सकती है। फिलहाल, सभी की निगाहें कैबिनेट की मंजूरी और फाइनल गाइडलाइन पर टिकी हैं।
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