उत्तर प्रदेश में न्यायपालिका ने सहमति से बने संबंधों और झूठे मुकदमों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला एक बार फिर इस बात पर जोर देता है कि कानूनी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। मंगलवार, 28 फरवरी को एक रेप केस में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका (Anticipatory Bail Plea) पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बालिगों के बीच सहमति से लंबे समय तक चलने वाला शारीरिक संबंध (Physical Relationship) 'बलात्कार' की श्रेणी में नहीं आता है।READ ALSO:-भीषण गर्मी में पसीना बहा रहे श्रमिकों के लिए केंद्र सरकार का बड़ा कदम; राज्यों को जारी की सख्त एडवाइजरी, बदलेंगे काम के घंटे
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला (Justice Rajiv Lochan Shukla) की सिंगल बेंच (एकल पीठ) ने इस मामले की गहनता से सुनवाई की। दोनों पक्षों की लंबी दलीलों और पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज बयानों में भारी विरोधाभास (Contradiction) पाए जाने के बाद, कोर्ट ने आरोपी को सशर्त अग्रिम जमानत दे दी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला यह सुनिश्चित करता है कि जहां आपसी सहमति मौजूद हो, वहां बलात्कार के कड़े कानूनों का अनुचित प्रयोग न हो।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

क्या है पूरा मामला और पुलिस FIR की कहानी?

\r\n\r\n
इस कानूनी विवाद की शुरुआत उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले से होती है। जानकारी के मुताबिक, कथित पीड़िता ने आजमगढ़ के सिधारी थाने में आरोपी के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत एक अर्जी देकर रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पुलिस ने इस शिकायत के आधार पर आरोपी के खिलाफ नई भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा पंजीकृत किया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
याची (याचिकाकर्ता/आरोपी) के खिलाफ BNS की धारा 64 (बलात्कार), 115(2) (जानबूझकर चोट पहुंचाना) और 351(3) (आपराधिक धमकी) के तहत FIR दर्ज की गई थी। इस मामले में गिरफ्तारी की तलवार लटकती देख आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला अपने पक्ष में करने और कानूनी राहत पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया और अग्रिम जमानत की गुहार लगाई।
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n

बचाव पक्ष की दलील: 'रेप केस में फर्जी तरीके से फंसाया गया'

\r\n\r\n
इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याची के वकील ने बेहद मजबूती से अपना पक्ष रखा। वकील ने कोर्ट में दलील दी कि याची को इस पूरे बलात्कार के केस में पूरी तरह से फर्जी तरीके से फंसाया गया है। याची का इस मामले से पहले कोई भी आपराधिक इतिहास (Criminal History) नहीं रहा है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
बचाव पक्ष ने कोर्ट को बताया कि महिला द्वारा लगाए गए सभी आरोप निराधार हैं। कोर्ट ने बचाव पक्ष द्वारा रखे गए सभी तथ्यों, कॉल रिकॉर्ड्स और पहले दिए गए बयानों के आधार पर यह माना कि यह एकतरफा जबरदस्ती का मामला नहीं है, बल्कि सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय से चला आ रहा एक शारीरिक संबंध है, जिसे किसी भी कानूनी परिभाषा में बलात्कार नहीं माना जा सकता।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

FIR और पीड़िता के बयानों में सामने आया बड़ा विरोधाभास

\r\n\r\n
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला मुख्य रूप से अभियोजन (Prosecution) की कहानी में मौजूद खामियों और पीड़िता के अलग-अलग बयानों पर आधारित है। कोर्ट ने अपनी तल्ख टिप्पणी में कहा कि FIR और मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए बयानों में जमीन-आसमान का अंतर है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    पीड़िता का बैकग्राउंड: कोर्ट को बताया गया कि कथित पीड़िता लगभग 35 साल की एक विधवा महिला है, जिसका एक 15 साल का बेटा भी है। वह पूरी तरह से बालिग है और अपने अच्छे-बुरे फैसले लेने में सक्षम है।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    शुरुआती रिश्ते की बात छुपाई गई: कोर्ट ने पाया कि पुलिस में दर्ज FIR में कहीं भी यह जिक्र नहीं किया गया था कि पीड़िता और याचिकाकर्ता के बीच पहले से ही कोई सहमति से रिश्ता था। FIR की कहानी एक आम आपराधिक घटना की तरह पेश की गई।
    \r\n
  4. \r\n
  5. \r\n
    BNSS 183 के तहत बयान: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 183 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराए गए बयान में पीड़िता ने खुद यह स्वीकार किया कि उसने साल 2022 से याची से फोन पर बात करना शुरू कर दिया था। इसके बाद उन दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बने थे।
    \r\n
  6. \r\n
  7. \r\n
    मेडिकल रिपोर्ट में खुलासा: पुलिस द्वारा कराई गई मेडिकल जांच के दौरान भी डॉक्टर को दिए गए बयान में पीड़िता ने यह बात मानी कि वह और याचिकाकर्ता साल 2024 से एक-दूसरे के साथ गहरे रिश्ते (Relationship) में थे।
    \r\n
  8. \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

बंदूक की नोक पर रेप का आरोप और कोर्ट की टिप्पणी

\r\n\r\n
सरकारी वकील ने अग्रिम जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। सरकार की तरफ से दलील दी गई कि याची इस मामले में अकेला नामजद आरोपी है और उसने विधवा महिला की मजबूरी का फायदा उठाया है। प्रॉसिक्यूशन (अभियोजन पक्ष) ने कोर्ट में यह दावा किया कि अक्टूबर 2025 में आरोपी ने पीड़िता के साथ 'बंदूक की नोक पर' (At gunpoint) बलात्कार की घटना को अंजाम दिया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
हालांकि, जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की पीठ ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा, "जहां तक इस घटना का सवाल है, जिसमें याची के बारे में कहा गया है कि उसने बंदूक की नोक पर पीड़िता के साथ रेप किया... अदालत की राय में यह BNSS की धारा 183 के तहत दर्ज बयान में बताई गई प्रेम संबंध की कहानी से बिल्कुल मेल नहीं खाती है।"
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

क्यों बिगड़ा दोनों के बीच का रिश्ता?

\r\n\r\n
सुनवाई के दौरान इस रिश्ते के टूटने और विवाद के शुरू होने की असली वजह भी सामने आई। कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, याचिकाकर्ता (आरोपी) पहले से शादीशुदा था। एक दिन याची की पत्नी ने कथित पीड़िता को फोन किया। पत्नी ने पीड़िता को बताया कि उसके पति (याची) के कई अन्य महिलाओं के साथ भी रिश्ते रहे हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इस फोन कॉल और खुलासे के बाद पीड़िता आहत हुई और उसने याची से अपना सारा संपर्क बंद कर दिया। अभियोजन की कहानी के अनुसार, इसी संपर्क टूटने के बाद अक्टूबर 2025 में रेप की कथित घटना हुई। लेकिन कोर्ट ने माना कि BNSS की धारा 173(4) के तहत दी गई अर्जी और दर्ज FIR में रिश्ते, पत्नी की कॉल और आपसी मनमुटाव जैसी 'महत्वपूर्ण डिटेल्स' का न होना, प्रथम दृष्टया (Prima Facie) पूरी पुलिस कहानी पर एक बड़ा शक पैदा करता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

कोर्ट का अंतिम आदेश: मिली सशर्त अग्रिम जमानत

\r\n\r\n
सभी कानूनी पहलुओं, बयानों के विरोधाभास और याची के स्वच्छ आपराधिक रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आरोपी के पक्ष में रहा। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय दंड व्यवस्था के अंतर्गत, BNS की धारा 64(1) (रेप की सजा) का अपराध ऐसे मामलों में नहीं बनता है जहां संबंध लंबे समय तक आपसी रजामंदी से बने हों।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की अग्रिम जमानत अर्जी (Anticipatory Bail Application) को मंजूर कर लिया। हालांकि, कोर्ट ने यह जमानत बिना शर्तों के नहीं दी है। कोर्ट ने याची को सख्त निर्देश दिए हैं कि वह इस पुलिस जांच में जांच अधिकारी (IO) का पूरी तरह से सहयोग करेगा। वह किसी भी गवाह को डराने, धमकाने या सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश नहीं करेगा। जरूरत पड़ने पर उसे थाने में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला देश की न्यायिक प्रणाली में एक नजीर (Precedent) पेश करता है। यह आदेश स्पष्ट रूप से इस बात को रेखांकित करता है कि अदालतों को उन मामलों में बहुत सावधानी से काम लेना चाहिए जहां एक लंबे समय तक चले सहमति वाले रिश्ते के खटास में बदलने के बाद रेप के आरोप लगाए जाते हैं। बालिगों के बीच आपसी रजामंदी से बने शारीरिक संबंधों को रिश्ते टूटने के बाद आपराधिक रंग देना कानून का दुरुपयोग माना जा सकता है। यह फैसला न केवल झूठे मुकदमों से निर्दोषों को बचाने में मदद करेगा, बल्कि पुलिस जांच के दौरान बयानों की सत्यता (BNSS 183 बनाम FIR) की महत्ता को भी स्थापित करेगा। न्यायिक व्यवस्था का यह दृष्टिकोण समाज में कानून के प्रति विश्वास को और मजबूत करता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
पढ़िए फटाफट खबरेंस्वाइप करके पढ़ें