थानाभवन (कृषि डेस्क): भारत की आत्मा गांवों में बसती है और गांवों की धड़कन हमारे किसान हैं। आज जब रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से हमारी मिट्टी की उर्वरक क्षमता और मानव स्वास्थ्य दोनों ही गंभीर खतरे में हैं, तब 'प्राकृतिक खेती' (Natural Farming) ही एकमात्र संजीवनी नजर आती है। इसी महत्वपूर्ण विषय पर किसानों को जागरूक करने और केंद्र सरकार की कृषि नीतियों को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से थानाभवन में एक ऐतिहासिक किसान गोष्ठी एवं प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।READ ALSO:-मेरठ हत्याकांड: प्यार में अंधी मां ने प्रेमी संग मिलकर 7 साल के बेटे अंगदवीर की गला रेतकर की हत्या, रोंगटे खड़े कर देगा सच
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कस्बे के 'राजधर्म गौ नेचुरल फार्म' पर आयोजित इस एक दिवसीय विशाल कार्यशाला में सैकड़ों की संख्या में किसानों, कृषि विशेषज्ञों, शासन-प्रशासन के अधिकारियों और राजनीतिक हस्तियों ने भाग लिया।
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स्वस्थ और आत्मनिर्भर भारत का रास्ता खेतों से होकर जाता है
\r\n\r\nकार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित उत्तर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री सुरेश राणा ने किसानों के साथ सीधा और आत्मीय संवाद स्थापित किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि हमें अपने देश को स्वस्थ, समृद्ध और पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बनाना है, तो प्राकृतिक खेती को सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि एक 'जनआंदोलन' का रूप देना होगा।
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\r\n\r\n\r\n"हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ धरती और शुद्ध पर्यावरण छोड़कर जाना है। रासायनिक खेती ने हमें उत्पादन तो दिया, लेकिन हमारी मिट्टी का स्वास्थ्य बिगाड़ दिया। अब समय आ गया है कि हम वापस अपनी जड़ों की ओर लौटें और प्राकृतिक खेती को अपनाएं।" — सुरेश राणा, पूर्व मंत्री\r\n
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पूर्व मंत्री ने किसानों से एक बहुत ही व्यावहारिक अपील करते हुए कहा कि यदि किसी किसान के लिए एक झटके में पूरी तरह से प्राकृतिक खेती पर आना संभव न हो, तो वह कम से कम अपनी कुल कृषि भूमि के एक छोटे हिस्से (एक बीघा या एक एकड़) से इसकी शुरुआत करे। जब किसान स्वयं इसके लाभों— जैसे कम लागत और उच्च गुणवत्ता वाली फसल— को अपनी आंखों से देखेंगे, तो वे स्वतः ही इसे बड़े पैमाने पर अपना लेंगे।
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देसी गाय आधारित कृषि मॉडल: शून्य लागत, अधिकतम लाभ
\r\n\r\nइस कार्यशाला का सबसे प्रमुख आकर्षण भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय पदाधिकारी एवं देश के प्रसिद्ध जैविक खेती विशेषज्ञ ठाकुर धर्मपाल सिंह का व्याख्यान और उनके द्वारा प्रस्तुत किया गया 'गौ आधारित प्राकृतिक खेती मॉडल' रहा।
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ठाकुर धर्मपाल सिंह ने किसानों को वैज्ञानिक और व्यावहारिक दोनों तरीकों से समझाया कि कैसे एक देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से कई एकड़ जमीन पर शून्य लागत वाली खेती (Zero Budget Natural Farming) की जा सकती है।
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प्राकृतिक खेती और रासायनिक खेती के बीच मुख्य अंतर:
\r\n\r\n| \r\n विशेषता \r\n | \r\n \r\n प्राकृतिक / जैविक खेती \r\n | \r\n \r\n रासायनिक खेती \r\n | \r\n
| \r\n लागत \r\n | \r\n \r\n अत्यंत कम (गोबर/गोमूत्र आधारित खाद) \r\n | \r\n \r\n बहुत अधिक (महंगे उर्वरक और कीटनाशक) \r\n | \r\n
| \r\n मिट्टी का स्वास्थ्य \r\n | \r\n \r\n केंचुए और मित्र कीट बढ़ते हैं, उर्वरता लौटती है \r\n | \r\n \r\n मिट्टी बंजर होती है, मित्र कीट मर जाते हैं \r\n | \r\n
| \r\n मानव स्वास्थ्य \r\n | \r\n \r\n फसल विषमुक्त और पौष्टिक होती है \r\n | \r\n \r\n रसायनों के कारण कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां \r\n | \r\n
| \r\n जल संरक्षण \r\n | \r\n \r\n कम सिंचाई की आवश्यकता होती है \r\n | \r\n \r\n रसायनों के कारण पानी की अधिक खपत होती है \r\n | \r\n
| \r\n पर्यावरण \r\n | \r\n \r\n पूरी तरह से इको-फ्रेंडली (पर्यावरण अनुकूल) \r\n | \r\n \r\n भूजल और हवा को प्रदूषित करती है \r\n | \r\n
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प्रदर्शनी में दिखा खेती का भविष्य: बायोगैस और जीवामृत
\r\n\r\nगोष्ठी के अंतिम चरण में सभी उपस्थित किसानों, पूर्व मंत्री सुरेश राणा और प्रशासनिक अधिकारियों ने ठाकुर धर्मपाल सिंह द्वारा विकसित 'गौ आधारित प्राकृतिक खेती मॉडल' का बारीकी से अवलोकन किया।
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इस प्रदर्शनी में मुख्य रूप से यह दिखाया गया कि कैसे देसी गाय के गोबर और गोमूत्र को प्रोसेस करके बायोगैस (Gas Production) का निर्माण किया जा सकता है। इसके साथ ही, गैस प्लांट से निकलने वाली स्लरी (तरल अपशिष्ट) से उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद (जीवामृत और घन जीवामृत) कैसे तैयार की जाती है। किसानों ने इस पूरी प्रक्रिया को लाइव देखकर प्राकृतिक खेती के व्यावहारिक और तकनीकी पक्षों की बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की।
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प्रगतिशील किसानों ने साझा की अपनी 'सक्सेस स्टोरी'
\r\n\r\nसिर्फ किताबी बातें नहीं, बल्कि इस गोष्ठी में उन किसानों को भी मंच दिया गया जो पहले से ही प्राकृतिक खेती कर रहे हैं और भारी मुनाफा कमा रहे हैं। इन किसानों की सफलता की कहानियों ने वहां मौजूद अन्य किसानों में एक नया उत्साह भर दिया:
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- \r\n सुभावरी चौहान (सहारनपुर): महिला सशक्तिकरण की मिसाल सुभावरी चौहान ने बताया कि कैसे उन्होंने रसायनों का त्याग कर पूरी तरह से प्राकृतिक खेती अपनाई, जिससे उनकी फसल की बाजार में मांग भी बढ़ी और उन्हें बेहतर दाम भी मिल रहे हैं।\r\n \r\n
- \r\n लोकेश शर्मा (एलम): इन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि शुरुआत में उत्पादन थोड़ा कम लगा, लेकिन लागत शून्य होने के कारण मुनाफा कहीं अधिक था। अब उनकी मिट्टी की गुणवत्ता पूरी तरह सुधर चुकी है।\r\n \r\n
- \r\n श्याम सिंह (नागल): इन्होंने अन्य किसानों को जीवामृत बनाने की विधि और फसलों को प्राकृतिक तरीके से बीमारियों से बचाने के देसी उपाय समझाए।\r\n \r\n
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केंद्र सरकार की नीतियों पर चर्चा और प्रमुख उपस्थितियां
\r\n\r\nकार्यक्रम के दौरान मंच से बोलते हुए भाजपा जिलाध्यक्ष रामजीलाल कश्यप, किसान मोर्चा जिलाध्यक्ष सत्यपाल सिंह, क्षेत्रीय मंत्री वरुण मलिक और क्षेत्रीय उपाध्यक्ष गौरव तोमर ने भी अपने विचार रखे। सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व में केंद्र सरकार किसानों की आय दोगुनी करने और कृषि को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। प्राकृतिक खेती इसी दिशा में उठाया गया एक सबसे महत्वपूर्ण कदम है।
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मुख्य विकास अधिकारी (CDO) और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों ने भी शासन द्वारा चलाई जा रही विभिन्न कृषि योजनाओं, अनुदानों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी किसानों को दी।
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कार्यक्रम को सफल बनाने में इन गणमान्य लोगों की रही विशेष उपस्थिति:
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- \r\n राजेंद्र मादलपुर (भाजपा जिला महामंत्री)\r\n \r\n
- \r\n ओंकार राणा (भारतीय किसान संघ जिलाध्यक्ष)\r\n \r\n
- \r\n डॉ. संजय सिंह (भाजपा नेता एवं कार्यक्रम के कुशल संचालक)\r\n \r\n
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इस विशाल किसान गोष्ठी और प्रदर्शनी ने थानाभवन और आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों के बीच प्राकृतिक खेती को लेकर एक नई अलख जगाई है। कार्यक्रम का समापन इस सामूहिक संकल्प के साथ हुआ कि धरती माता को रसायनों के जहर से मुक्त कराकर एक स्वस्थ और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव रखी जाएगी। शासन-प्रशासन के अधिकारियों, कर्मचारियों और बड़ी संख्या में आए किसानों की सक्रिय भागीदारी ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।
Sabse pehle comment karne wale banein.