मुजफ्फरनगर (कृषि एवं राजनीति डेस्क): देश का अन्नदाता एक बार फिर अपने हकों की रक्षा और कृषि क्षेत्र में विदेशी दखलंदाजी के खिलाफ सड़कों पर उतरने को मजबूर हो गया है। उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर जिला, जिसे हमेशा से ही किसान आंदोलनों की 'नर्सरी' और 'क्रांति की जन्मस्थली' माना जाता रहा है, मंगलवार की सुबह एक बार फिर से किसानों के भारी नारों और पुलिस के सायरन से गूंज उठा। मुद्दा है— 'इंडो-अमेरिका ट्रेड डील' (भारत-अमेरिका व्यापार समझौता), जिसे किसान संगठन भारतीय कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए 'डेथ वारंट' (Death Warrant) करार दे रहे हैं।READ ALSO:-गाजियाबाद में खून के रिश्तों का कत्ल: बर्थडे पार्टी से लौटे कलयुगी बेटों ने माता-पिता को लात-घूंसों और हथौड़े से कूंचा, दोनों की दर्दनाक मौत
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इस विवादित व्यापार समझौते के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने और केंद्र सरकार को जगाने के लिए 'भारतीय किसान मजदूर संयुक्त मोर्चा' ने मंगलवार को दिल्ली के ऐतिहासिक 'किसान घाट' (Kisan Ghat) पर एक बड़े और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था। इसी प्रस्तावित प्रदर्शन का नेतृत्व करने के लिए मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी शाह आलम (Chaudhary Shah Alam) अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो रहे थे, लेकिन पुलिस और प्रशासन ने उनके काफिले को बीच रास्ते में ही रोक दिया, जिसके बाद स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
आइए, इस पूरे घटनाक्रम, पुलिस की कार्रवाई, किसानों के आक्रोश और इंडो-अमेरिका ट्रेड डील से जुड़ी उन तमाम बारीकियों को विस्तार से समझते हैं, जिनके कारण देश का अन्नदाता एक बार फिर से आंदोलन की राह पर है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

ग्राउंड जीरो का हाल: नुमाइश कैंप गेट पर पुलिस का कड़ा पहरा और टकराव

\r\n\r\n
मंगलवार सुबह का सूरज मुजफ्फरनगर के लिए एक बड़ी राजनीतिक और सामाजिक हलचल लेकर आया। तय कार्यक्रम के अनुसार, भारतीय किसान मजदूर संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी शाह आलम सुबह करीब 8:30 बजे अपने काफिले और सैकड़ों किसान कार्यकर्ताओं के साथ मुजफ्फरनगर से दिल्ली के लिए रवाना हुए। किसानों की योजना थी कि वे शांतिपूर्ण तरीके से मार्च करते हुए दिल्ली के किसान घाट पहुंचेंगे और वहां जाकर पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित कर अपना विरोध दर्ज कराएंगे।
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n
लेकिन, मुजफ्फरनगर का स्थानीय खुफिया तंत्र (LIU) और पुलिस प्रशासन पहले से ही हाई अलर्ट पर था। प्रशासन को ऊपर से सख्त निर्देश थे कि किसी भी सूरत में किसानों के जत्थे को दिल्ली की सीमा में प्रवेश करने से रोका जाए, ताकि राष्ट्रीय राजधानी में कोई नया बखेड़ा खड़ा न हो।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
कैसे रोका गया काफिला? जैसे ही चौधरी शाह आलम का काफिला शहर के प्रमुख चौराहे 'नुमाइश कैंप गेट' (Numaish Camp Gate) के पास पहुंचा, वहां पहले से ही भारी संख्या में पुलिस बल और पीएसी (PAC) के जवान बैरिकेड्स लगाकर मुस्तैद थे।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    पुलिस ने अचानक बैरिकेडिंग को आगे कर दिया और किसानों के वाहनों को चारों तरफ से घेर लिया।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    जब शाह आलम ने अपनी गाड़ी से उतरकर पुलिस अधिकारियों से बात करनी चाही और उन्हें अपने शांतिपूर्ण मार्च का हवाला दिया, तो पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    पुलिस का तर्क था कि किसानों के पास दिल्ली में प्रदर्शन करने की कोई वैध अनुमति (Valid Permission) नहीं है और उनके जाने से कानून-व्यवस्था (Law and Order) की स्थिति बिगड़ सकती है।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इस पुलिसिया कार्रवाई को देखकर किसान नेता और उनके समर्थक भड़क उठे। मौके पर पुलिस के आला अधिकारियों और किसान नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक और बहस हुई, जिसने माहौल को और भी ज्यादा गर्म कर दिया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

सड़क पर उतरा किसानों का सैलाब: शुरू हुआ अनिश्चितकालीन धरना

\r\n\r\n
जब पुलिस ने किसी भी कीमत पर चौधरी शाह आलम और उनके समर्थकों को आगे नहीं जाने दिया, तो किसान कार्यकर्ताओं ने अपनी रणनीति में तुरंत बदलाव किया। पुलिस की इस दमनकारी कार्रवाई के विरोध में शाह आलम के समर्थक और संगठन के तमाम छोटे-बड़े पदाधिकारी नुमाइश कैंप गेट के ठीक सामने मुख्य सड़क के किनारे ही धरने पर बैठ गए।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
देखते ही देखते वहां सैकड़ों की संख्या में किसान इकट्ठा हो गए। हाथों में संगठन के झंडे लिए किसानों ने उत्तर प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी शुरू कर दी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

किसानों के प्रमुख नारे और आक्रोश:

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    "किसान एकता—जिंदाबाद!"
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    "तानाशाही नहीं चलेगी—नहीं चलेगी!"
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    "विदेशी कंपनियों को भगाओ—किसान बचाओ!"
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
धरना स्थल पर मौजूद कार्यकर्ताओं का स्पष्ट कहना था कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज कराना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। संगठन के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि सरकार पुलिस के दम पर किसानों की आवाज को दबाना चाहती है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान कभी भी लाठी और बंदूकों के जोर से डरा नहीं है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
\r\n
चौधरी शाह आलम का बयान: धरना स्थल पर मीडिया से मुखातिब होते हुए चौधरी शाह आलम ने कड़े शब्दों में कहा, "आज जो कुछ भी नुमाइश कैंप पर हुआ है, वह सरासर लोकतंत्र की हत्या है। हम कोई उपद्रवी नहीं हैं, हम इस देश के अन्नदाता हैं। हम दिल्ली के किसान घाट पर जाकर शांति से अपना ज्ञापन सौंपना चाहते थे। लेकिन यह सरकार इतनी डरी हुई है कि यह हमें हमारे ही देश की राजधानी में जाने से रोक रही है। जब तक इंडो-अमेरिका ट्रेड डील को रद्द नहीं किया जाता, हमारी यह लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक जारी रहेगी।"
\r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

पुलिस और प्रशासन की मुस्तैदी: छावनी में तब्दील हुआ इलाका

\r\n\r\n
किसानों के इस अचानक धरने और बढ़ती भीड़ को देखते हुए मुजफ्फरनगर जिला प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। स्थिति को नियंत्रण से बाहर जाने से रोकने के लिए तुरंत अतिरिक्त पुलिस बल को मौके पर बुलाया गया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखने और किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना (Untoward Incident) को टालने के लिए थाना सिविल लाइन (Civil Lines Police Station) और खालापार (Khalapar Police Station) की पुलिस फोर्स को भारी संख्या में मौके पर तैनात कर दिया गया। इसके अलावा, वज्र वाहन (Riot Control Vehicles) और फायर ब्रिगेड की गाड़ियों को भी स्टैंडबाय पर रखा गया है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
शहर के पुलिस अधीक्षक (SP City) और क्षेत्राधिकारी (CO) स्तर के अधिकारी खुद मौके पर मौजूद रहकर स्थिति की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। पुलिस अधिकारियों का प्रयास है कि किसान नेताओं को समझा-बुझाकर धरने को समाप्त कराया जाए, लेकिन किसान अपनी मांगों को लेकर अड़े हुए हैं और किसी भी सूरत में पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इस धरने के कारण शहर के कई मुख्य मार्गों पर यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ है और आम जनता को भी जाम की समस्या से जूझना पड़ रहा है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

आखिर क्या है 'इंडो-अमेरिका ट्रेड डील' और क्यों खफा हैं भारतीय किसान?

\r\n\r\n
इस पूरे आंदोलन की जड़ वह 'इंडो-अमेरिका ट्रेड डील' (भारत-अमेरिका व्यापार समझौता) है, जिसे लेकर देश भर के किसान संगठनों में भारी बेचैनी और गुस्सा है। आम जनता के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर देश का अन्नदाता इस अंतरराष्ट्रीय समझौते का इतना कड़ा विरोध क्यों कर रहा है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
भारतीय किसान मजदूर संयुक्त मोर्चा और अन्य कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यह डील भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए एक 'मीठा जहर' साबित हो सकती है। किसानों की मुख्य चिंताएं निम्नलिखित हैं:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

1. विदेशी कृषि उत्पादों की डंपिंग (Dumping of Cheap Foreign Goods)

\r\n\r\n
अमेरिका अपने किसानों को हर साल अरबों डॉलर की भारी-भरकम सब्सिडी (Agricultural Subsidies) देता है। इस सब्सिडी के कारण अमेरिका में पैदा होने वाले कृषि उत्पाद (जैसे— गेहूं, मक्का, सेब, सोयाबीन) बहुत सस्ते होते हैं। किसानों को डर है कि इस ट्रेड डील के लागू होने के बाद, भारत के बाजारों में अमेरिकी उत्पादों की बाढ़ (Dumping) आ जाएगी। जब बाजार में विदेशी सस्ता अनाज और फल उपलब्ध होंगे, तो भारतीय किसानों की उपज को कौन खरीदेगा? इससे भारत के किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य (MSP) कभी नहीं मिल पाएगा और वे कर्ज के जाल में डूब जाएंगे।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

2. डेयरी और पोल्ट्री सेक्टर (Dairy and Poultry Sector) पर मंडराता संकट

\r\n\r\n
इस डील का सबसे बड़ा और विनाशकारी असर भारत के डेयरी (दुग्ध उत्पादन) और पोल्ट्री (मुर्गी पालन) उद्योग पर पड़ने की आशंका है। अमेरिका लंबे समय से भारतीय बाजार में अपने डेयरी उत्पादों (जैसे— सूखा दूध, मक्खन, चीज़) और पोल्ट्री उत्पादों (चिकन लेग्स) को बेचने के लिए टैक्स (Tariff) में भारी छूट की मांग कर रहा है। भारत में करोड़ों छोटे और सीमांत किसान, भूमिहीन मजदूर और विशेषकर ग्रामीण महिलाएं अपनी आजीविका के लिए सिर्फ पशुपालन पर निर्भर हैं। अगर अमेरिकी डेयरी कंपनियों को भारत में खुला प्रवेश मिल गया, तो भारत का यह असंगठित और ग्रामीण डेयरी ढांचा पूरी तरह से तहस-नहस हो जाएगा। अमूल और पराग जैसी स्वदेशी सहकारी समितियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

3. बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) और बीजों पर एकाधिकार

\r\n\r\n
अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां (Multinational Corporations) बीजों के पेटेंट (Patent) और बौद्धिक संपदा अधिकारों को लेकर बहुत सख्त हैं। किसानों का आरोप है कि इस डील के जरिए अमेरिकी कंपनियां भारतीय कृषि बाजार पर अपना एकाधिकार (Monopoly) जमाना चाहती हैं। इससे किसानों को हर बार बुवाई के लिए महंगे विदेशी बीज खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ेगा और बीजों को सहेज कर अगली फसल में इस्तेमाल करने का उनका पारंपरिक अधिकार छिन जाएगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

4. लेवल प्लेइंग फील्ड (Level Playing Field) का अभाव

\r\n\r\n
भारतीय किसान जहां आज भी सिंचाई, बिजली, खाद और कर्ज की बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है, वहीं अमेरिकी किसान पूरी तरह से मशीनीकृत (Mechanized) और कॉर्पोरेट फार्मिंग (Corporate Farming) करते हैं। ऐसे में दोनों देशों के किसानों के बीच कोई बराबरी का मुकाबला नहीं हो सकता। किसानों का कहना है कि यह डील दो असमान पक्षों के बीच हो रही है, जिसमें नुकसान सिर्फ और सिर्फ भारतीय किसान का होना तय है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इन्हीं तमाम गंभीर चिंताओं को लेकर भारतीय किसान मजदूर संयुक्त मोर्चा यह मांग कर रहा है कि कृषि, डेयरी और पोल्ट्री जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को किसी भी अंतरराष्ट्रीय मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement - FTA) से पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

पश्चिमी उत्तर प्रदेश: किसान आंदोलनों का अजेय गढ़

\r\n\r\n
मुजफ्फरनगर और पूरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इलाका (जिसे जाटलैंड और गन्ना बेल्ट भी कहा जाता है) भारत में किसान आंदोलनों का सबसे बड़ा और अजेय गढ़ रहा है। यह वह धरती है जिसने महान किसान नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत (Chaudhary Mahendra Singh Tikait) को जन्म दिया, जिनके एक इशारे पर लाखों किसान दिल्ली के बोट क्लब से लेकर मुजफ्फरनगर की सिसौली तक को छावनी में बदल देते थे।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
आज भी इस क्षेत्र के किसानों के डीएनए (DNA) में अपने हकों के लिए लड़ना शामिल है। 2020-21 के ऐतिहासिक कृषि कानून विरोधी आंदोलन (Farmers' Protest) में भी मुजफ्फरनगर की भूमिका सबसे निर्णायक रही थी। यही कारण है कि प्रशासन इस क्षेत्र में होने वाले किसी भी छोटे से छोटे किसान प्रदर्शन को भी बेहद गंभीरता से लेता है, क्योंकि यहां एक छोटी सी चिंगारी भी एक बड़े राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले सकती है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
पुलिस द्वारा चौधरी शाह आलम को रोका जाना भले ही प्रशासन की नजर में एक 'प्रिवेंटिव मेजर' (Preventive Measure) हो, लेकिन किसानों की नजर में यह एक बड़ा उकसावा है। पश्चिमी यूपी की कई खाप पंचायतें (Khap Panchayats) और अन्य बड़े किसान संगठन भी इस घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। यदि पुलिस ने बल प्रयोग किया या किसानों की मांगों को अनसुना किया गया, तो यह आंदोलन केवल मुजफ्फरनगर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शामली, बागपत, मेरठ, सहारनपुर और बिजनौर जैसे आसपास के जिलों में भी फैल सकता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

आगे क्या होगा? (Future Course of Action)

\r\n\r\n
वर्तमान में नुमाइश कैंप गेट पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। सड़क के एक तरफ पुलिस का भारी लाव-लश्कर है, तो दूसरी तरफ अपने हकों की आवाज़ बुलंद करते किसानों का हुजूम।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
मोर्चे की चेतावनी: भारतीय किसान मजदूर संयुक्त मोर्चा के पदाधिकारियों ने प्रशासन को स्पष्ट अल्टीमेटम (Ultimatum) दे दिया है कि यदि उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से दिल्ली नहीं जाने दिया गया, तो वे अपने इस धरने को और भी व्यापक रूप दे देंगे। संगठन ने अपने आसपास के जिलों और गांवों के कार्यकर्ताओं को भी मुजफ्फरनगर पहुंचने का संदेश भेज दिया है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
अब सबकी निगाहें स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या प्रशासन किसानों को मनाने में सफल हो पाएगा? या फिर यह धरना एक और बड़े ऐतिहासिक किसान आंदोलन की शुरुआत साबित होगा?
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की आत्मा आज भी गांवों और खेतों में बसती है। इंडो-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर किसानों की चिंताएं केवल आर्थिक नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व से जुड़ी हैं। मुजफ्फरनगर का यह धरना सरकार के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि विदेशी व्यापार नीतियों को बनाते समय देश के अन्नदाता को दरकिनार नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद ही हर समस्या का समाधान है, लाठी और बैरिकेड्स नहीं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
(पल-पल बदलते इस पूरे घटनाक्रम की सबसे तेज और सटीक अपडेट के लिए खबरीलाल न्यूज़ नेटवर्क से जुड़े रहें।)
विज्ञापन
विज्ञापन
पढ़िए फटाफट खबरेंस्वाइप करके पढ़ें