उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में एक बार फिर प्रदेश के बंटवारे और नए राज्य के गठन की मांग ने जोर पकड़ लिया है। लेकिन इस बार मांग 'हरित प्रदेश' की नहीं, बल्कि 'ग्रेटर दिल्ली' (Greater Delhi) की है। भारतीय किसान आंदोलन (Bhartiya Kisan Andolan) के एक प्रतिनिधिमंडल ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 9 प्रमुख जिलों को दिल्ली में विलय कर एक पूर्ण राज्य बनाने की मांग उठाई है।READ ALSO:-UP School Big Update: यूपी में छात्रों और शिक्षकों के लिए 'डबल खबर'; सीएम योगी ने 5 जनवरी तक लगाई स्कूलों पर 'ताला', उधर 2026 के लिए छुट्टियों का 'पिटारा' खुला
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शनिवार को भारतीय किसान आंदोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलदीप कुमार त्यागी के नेतृत्व में किसान नेताओं ने राज्यसभा सांसद और भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी से उनके नई मोहनपुरी स्थित आवास पर मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने एक विस्तृत मांग पत्र सौंपते हुए केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की गुहार लगाई।
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क्या है 'ग्रेटर दिल्ली' की मांग? (The Demand for Greater Delhi)
\r\n\r\nकिसान नेताओं द्वारा सौंपे गए दस सूत्रीय ज्ञापन में तर्क दिया गया है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का विकास और प्रशासनिक सुगमता तभी संभव है जब इसे लखनऊ के बजाय दिल्ली से जोड़ा जाए।
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प्रस्तावित जिले: ज्ञापन में जिन जिलों को दिल्ली में शामिल करने की मांग की गई है, वे हैं:
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- \r\n मेरठ (Meerut)\r\n \r\n
- \r\n गाजियाबाद (Ghaziabad)\r\n \r\n
- \r\n गौतमबुद्धनगर (Noida/GB Nagar)\r\n \r\n
- \r\n बुलंदशहर (Bulandshahr)\r\n \r\n
- \r\n हापुड़ (Hapur)\r\n \r\n
- \r\n शामली (Shamli)\r\n \r\n
- \r\n मुजफ्फरनगर (Muzaffarnagar)\r\n \r\n
- \r\n बिजनौर (Bijnor)\r\n \r\n
- \r\n सहारनपुर (Saharanpur)\r\n \r\n
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कुलदीप कुमार त्यागी ने कहा कि इन जिलों को दिल्ली के साथ जोड़कर एक नया राज्य 'ग्रेटर दिल्ली प्रदेश' बनाया जाना चाहिए।
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क्यों उठ रही है विलय की मांग? (Why the Merger?)
\r\n\r\nप्रतिनिधिमंडल ने सांसद के सामने कई तर्क रखे जो पश्चिमी यूपी के लोगों की लंबे समय से चली आ रही पीड़ा को बयां करते हैं:
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- \r\n राजधानी और हाई कोर्ट से दूरी: कुलदीप त्यागी ने बताया कि पश्चिमी यूपी के लोगों के लिए राजधानी लखनऊ की दूरी लगभग 600 किलोमीटर और हाई कोर्ट (इलाहाबाद) की दूरी 700 किलोमीटर है। न्याय पाने के लिए एक वादी को पूरी रात का सफर तय करना पड़ता है, जो बेहद खर्चीला और कष्टदायक है।\r\n \r\n
- \r\n आर्थिक योगदान बनाम उपेक्षा: नेताओं का दावा है कि उत्तर प्रदेश के कुल राजस्व और विकास में पश्चिमी यूपी का योगदान करीब 71 फीसदी है, लेकिन बदले में इस क्षेत्र को विकास का वो हिस्सा नहीं मिलता जिसका वह हकदार है। 25 करोड़ की आबादी वाले यूपी को संभालना प्रशासनिक रूप से कठिन हो रहा है।\r\n \r\n
- \r\n दिल्ली से निकटता: प्रस्तावित जिले पहले से ही एनसीआर (NCR) का हिस्सा हैं या दिल्ली से सटे हुए हैं। भौगोलिक और आर्थिक रूप से इनका दिल्ली के साथ एकीकरण ज्यादा व्यावहारिक है।\r\n \r\n
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सांसद का आश्वासन: 'केंद्र तक पहुंचाऊंगा बात'
\r\n\r\nराज्यसभा सांसद डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने किसान नेताओं की बातों को गंभीरता से सुना। उन्होंने सहमति जताते हुए आश्वासन दिया कि वह इस प्रस्ताव को लिखित रूप में केंद्र सरकार के समक्ष रखेंगे। उन्होंने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की समस्याओं और यहां की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए इस मांग पर विचार किया जाना चाहिए।
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प्रतिनिधिमंडल में मुख्य रूप से मोहन सिंह नेगी, महेंद्र सिंह त्यागी, प्रदीप त्यागी, गुड्डू, दीपक और अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे।
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'हरित प्रदेश' से कैसे अलग है 'ग्रेटर दिल्ली'?
\r\n\r\nदशकों से पश्चिमी यूपी को अलग करके 'हरित प्रदेश' बनाने की मांग होती रही है, जिसका नेतृत्व अक्सर राष्ट्रीय लोक दल (RLD) और अजित सिंह जैसे नेता करते रहे हैं। हरित प्रदेश की मांग में एक स्वतंत्र राज्य की बात थी, जिसकी राजधानी मेरठ या आगरा हो सकती थी। वहीं, 'ग्रेटर दिल्ली' की मांग थोड़ी अलग है। इसमें पश्चिमी यूपी के जिलों को दिल्ली (केंद्र शासित प्रदेश/राज्य) की सीमाओं में विस्तार देकर एक बड़ा राज्य बनाने की बात कही गई है। यह कॉन्सेप्ट 1953 में दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश ने भी दिया था, जिसे अब दोबारा हवा दी जा रही है।
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सियासी हलचल और भविष्य (Political Implications)
\r\n\r\nपश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अलग राज्य का मुद्दा हमेशा से गरम रहा है। केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान भी कई बार पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने की वकालत कर चुके हैं। अब किसान संगठनों द्वारा 'ग्रेटर दिल्ली' के नाम पर इस मुद्दे को उठाना 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले एक नई बहस को जन्म दे सकता है।
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जानकारों का मानना है कि छोटे राज्य प्रशासनिक रूप से ज्यादा कारगर होते हैं, जैसा कि उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के उदाहरणों से साफ है। हालांकि, दिल्ली के साथ विलय में कई संवैधानिक पेंच भी हैं, क्योंकि दिल्ली का अपना एक विशेष दर्जा (NCT) है।
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मेरठ से उठी 'ग्रेटर दिल्ली' की यह मांग क्या दिल्ली के लुटियंस जोन तक पहुंचेगी, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन इतना तय है कि हाई कोर्ट बेंच और विकास में हिस्सेदारी को लेकर पश्चिमी यूपी में सुगबुगाहट तेज हो गई है। सांसद डॉ. बाजपेयी का आश्वासन इस आंदोलन को कितनी संजीवनी देता है, इस पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।
Sabse pehle comment karne wale banein.