मुंबई (कला एवं संस्कृति डेस्क / अनिल बेदाग): भारतीय शास्त्रीय संगीत और ग़ज़ल गायकी का इतिहास तब तक अधूरा है, जब तक उसमें 'मल्लिका-ए-ग़ज़ल' (Mallika-e-Ghazal) बेगम अख्तर का नाम न लिया जाए। बेगम अख्तर की आवाज़ में वह कशिश, वह दर्द और वह ठहराव था, जो सीधे सुनने वाले की रूह में उतर जाता था। उन्हीं की यादों, उनके जज़्बातों और उनकी अमर गायकी को एक बार फिर से जीवंत करने के लिए मुंबई की मायानगरी में एक बेहद खास और भावपूर्ण संगीतमय संध्या का आयोजन किया गया, जिसे नाम दिया गया— 'इंडियन ऑयल शाम-ए-अख्तरी' (Indian Oil Sham-e-Akhtari)।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इस भव्य आयोजन ने न केवल संगीत प्रेमियों को भावनाओं के समंदर में गोते लगाने पर मजबूर कर दिया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि सच्चा संगीत समय की सीमाओं से परे होता है। आइए, सुरों और यादों से सजी इस ऐतिहासिक शाम के हर एक पहलू को विस्तार से महसूस करते हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

 पद्मश्री डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में लौटी बेगम अख्तर की रूह

\r\n\r\n
इस संगीतमय संध्या का मुख्य आकर्षण भारत की प्रख्यात शास्त्रीय गायिका और पद्मश्री (Padma Shri) से सम्मानित डॉ. सोमा घोष की शानदार प्रस्तुति रही। सोमा घोष, जो बनारस घराने की समृद्ध गायकी परंपरा की संवाहक मानी जाती हैं, ने मंच संभालते ही पूरे सभागार का माहौल बदल दिया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
उन्होंने बेगम अख्तर द्वारा गाई गई चुनिंदा और सबसे लोकप्रिय ग़ज़लों, ठुमरी और दादरा को अपनी मखमली आवाज़ में प्रस्तुत किया। डॉ. सोमा घोष की गायकी में बेगम अख्तर जैसी ही नज़ाकत, दर्द और शब्दों की गहरी समझ झलक रही थी। मंच से दर्शकों को संबोधित करते हुए डॉ. सोमा घोष ने बेहद भावुक शब्दों में कहा:
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n
\r\n
"बेगम अख्तर महज़ एक गायिका नहीं थीं; वे एहसास, दर्द और अदब की एक अमर आवाज़ हैं। उनके गाए हर लफ्ज़ में एक कहानी छिपी होती है। आज मेरी यह प्रस्तुति उस महान सम्राज्ञी के श्रीचरणों में एक छोटी सी संगीतमय पुष्पांजलि है।"
\r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
जैसे-जैसे डॉ. सोमा घोष के सुर ऊंचे होते गए, वैसे-वैसे वहां मौजूद दर्शक पुरानी यादों में खोते चले गए। 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया' और 'दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे' जैसी अमर रचनाओं ने पूरे ऑडिटोरियम को तालियों की गड़गड़ाहट से भर दिया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

डॉ. शुभंकर घोष की फिल्म: संघर्ष और कला-साधना का अद्भुत दस्तावेज़

\r\n\r\n
इस कार्यक्रम को केवल एक म्यूज़िकल कॉन्सर्ट (Musical Concert) तक सीमित नहीं रखा गया था, बल्कि इसे बेगम अख्तर के जीवन दर्शन से जोड़ने का एक अनूठा प्रयास किया गया। 'शाम-ए-अख्तरी' का एक और बेहद विशेष और भावुक आकर्षण डॉ. शुभंकर घोष (Dr. Shubhankar Ghosh) द्वारा निर्मित और निर्देशित एक शॉर्ट फिल्म रही।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
यह फिल्म पूरी तरह से बेगम अख्तर के जीवन, उनके संघर्षों और उनकी बेमिसाल कला-साधना पर आधारित थी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    फिल्म की खासियत: फिल्म में दिखाया गया कि कैसे बेगम अख्तर ने अपने जीवन के तमाम दुखों और त्रासदियों को अपनी गायकी का हथियार बना लिया। उनका जीवन आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने हर दर्द को एक खूबसूरत ग़ज़ल में तब्दील कर दिया।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    दर्शकों पर प्रभाव: जब यह डॉक्यूमेंट्री ऑडिटोरियम के बड़े पर्दे पर दिखाई गई, तो वहां मौजूद कई संगीत प्रेमियों और बुजुर्ग श्रोताओं की आंखें नम हो गईं।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इस फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान पूरे सभागार में एक ही अहसास गूंज रहा था— "जब कला श्रद्धांजलि बन जाए, तब हर सुर इतिहास रच देता है।" डॉ. शुभंकर घोष का यह सिनेमाई प्रयास बेगम अख्तर की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक बेहद सशक्त माध्यम साबित हुआ।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

बेगम अख्तर की विरासत: क्यों आज भी प्रासंगिक हैं उनके सुर?

\r\n\r\n
बेगम अख्तर (Akhtari Bai Faizabadi) ने अपने दौर में ग़ज़ल गायकी को कोठों और दरबारों से निकालकर आम अवाम और शास्त्रीय मंचों तक पहुंचाया था। उनके द्वारा गाए गए मिर्ज़ा ग़ालिब, मीर तक़ी मीर, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और शकील बदायुनी के कलाम आज भी संगीत के दीवानों के लिए किसी गीता या कुरान से कम नहीं हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
आज के इस शोर-शराबे वाले रीमिक्स (Remix) और ऑटो-ट्यून (Auto-tune) के दौर में, 'शाम-ए-अख्तरी' जैसे आयोजन यह याद दिलाते हैं कि असली संगीत वह है जो सुकून दे। डॉ. सोमा घोष ने बेगम साहिबा की उस परंपरा को जिस शुद्धता और समर्पण के साथ मुंबई के मंच पर पेश किया, उसने यह साबित कर दिया कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की जड़ें कितनी गहरी हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

हाउसफुल सभागार और दर्शकों का 'स्टैंडिंग ओवेशन'

\r\n\r\n
कार्यक्रम की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुंबई का विशाल सभागार (Auditorium) संगीत प्रेमियों से पूरी तरह खचाखच भरा (Houseful) हुआ था।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

आयोजन के प्रमुख आकर्षण:

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति: इस संगीतमय शाम में बॉलीवुड, साहित्य, और कला जगत से जुड़े कई दिग्गज और गणमान्य अतिथियों ने विशेष रूप से शिरकत की।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    इंडियन ऑयल का समर्थन: देश की प्रमुख पेट्रोलियम कंपनी 'इंडियन ऑयल' (Indian Oil) ने इस सांस्कृतिक कार्यक्रम को अपना सहयोग देकर भारतीय कला और विरासत को संरक्षित करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।
    \r\n
  4. \r\n
  5. \r\n
    स्टैंडिंग ओवेशन (Standing Ovation): कार्यक्रम के अंतिम चरण में, जब डॉ. सोमा घोष ने अपनी आखिरी ठुमरी पूरी की, तो पूरा सभागार अपनी कुर्सियों से खड़ा हो गया। दर्शकों ने लगातार कई मिनटों तक तालियां बजाकर (Standing Ovation) इस अद्भुत प्रस्तुति और बेगम अख्तर की स्मृतियों को अपना सर्वोच्च सम्मान दिया।
    \r\n
  6. \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

एक अविस्मरणीय संगीतमय यात्रा

\r\n\r\n
'इंडियन ऑयल शाम-ए-अख्तरी' कोई सामान्य इवेंट नहीं था; यह एक इबादत थी, एक तपस्या थी। पद्मश्री डॉ. सोमा घोष की मखमली आवाज़, डॉ. शुभंकर घोष की भावपूर्ण फिल्म और मुंबई के कला-प्रेमियों के उत्साह ने मिलकर इस शाम को सचमुच अविस्मरणीय (Unforgettable) बना दिया। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि जब तक सुर और ताल ज़िंदा हैं, बेगम अख्तर जैसी महान विभूतियां हमेशा हमारे दिलों में धड़कती रहेंगी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
ऐसी संगीतमय शामें आज की युवा पीढ़ी के लिए एक पुल का काम करती हैं, जो उन्हें अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती हैं। खबरीलाल कला डेस्क डॉ. सोमा घोष और इस पूरे आयोजन की टीम को इस सफल और रूहानी शाम के लिए हार्दिक बधाई देता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
पढ़िए फटाफट खबरेंस्वाइप करके पढ़ें