नई दिल्ली/देहरादून:
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क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आप दिल्ली में अपने घर पर सुबह का नाश्ता करें और दोपहर का खाना देहरादून की वादियों या मसूरी की पहाड़ियों में खाएं? कुछ साल पहले तक यह ख्याल किसी सपने जैसा लगता था, क्योंकि दिल्ली से देहरादून का सफर मतलब—मेरठ का जाम, मुजफ्फरनगर की भीड़भाड़ और टूटी सड़कों की थकान। लेकिन, अब यह सपना हकीकत में बदलने वाला है।Read also:-मेरठ: भीषण ठंड का टॉर्चर, कक्षा 9 तक के स्कूल दो दिन के लिए बंद, 10वीं-12वीं का समय बदला, DIOS का आदेश जारी
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उत्तर भारत की कनेक्टिविटी को नया आयाम देने वाला दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर (Delhi-Dehradun Economic Corridor) बनकर लगभग तैयार है। 210 किलोमीटर लंबी यह परियोजना सिर्फ डामर और कंक्रीट से बनी सड़क नहीं है, बल्कि यह विकास की एक नई रेखा है जो दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को एक सूत्र में पिरोने जा रही है। सूत्रों की मानें तो फरवरी के पहले हफ्ते के बाद किसी भी दिन इसका उद्घाटन हो सकता है।
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एक नए युग की शुरुआत: 'एक्सप्रेसवे' या 'सुपर हाईवे'?

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सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि इसे तकनीकी रूप से 'एक्सेस-कंट्रोल हाईवे' (Access-Controlled Highway) क्यों कहा जा रहा है, जबकि आम बोलचाल में नेता और जनता इसे 'एक्सप्रेसवे' कह रहे हैं।
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यह कॉरिडोर पारंपरिक एक्सप्रेसवे से थोड़ा अलग लेकिन सुविधाओं में उससे कहीं आगे है।
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    एक्सेस कंट्रोल: इसका मतलब है कि इस सड़क पर कोई भी, कहीं से भी नहीं चढ़ सकता। इसके लिए निश्चित एंट्री और एग्जिट प्वाइंट (Interchanges) बनाए गए हैं। इससे मवेशियों, ट्रैक्टरों या स्थानीय ट्रैफिक के अचानक सड़क पर आने का खतरा खत्म हो जाता है।
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    रफ्तार: इस कॉरिडोर को 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार के लिए डिजाइन किया गया है।
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    सुविधाएं: बेहतर राइड क्वालिटी, सुरक्षित अंडरपास, इंटरचेंज, स्मार्ट टोल प्लाजा और हर थोड़ी दूरी पर सुविधाजनक 'पिट स्टॉप' (Rest Areas) इसे देश के चुनिंदा हाई-स्पीड कॉरिडोर में शामिल करते हैं।
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सफरनामा: अक्षरधाम से दून तक का सफर कैसा होगा?

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इस कॉरिडोर का सफर दिल्ली के दिल अक्षरधाम से शुरू होता है। लेकिन क्या शुरुआत से ही सफर सुहाना होगा? ग्राउंड रिपोर्ट कुछ और ही बयां करती है।
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दिल्ली से लोनी: शुरुआती बाधाएं

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इस कॉरिडोर की शुरुआत अक्षरधाम मंदिर के पास से होती है। यह इलाका पहले से ही दिल्ली के सबसे व्यस्त ट्रैफिक प्वाइंट्स में से एक है।
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    चोक प्वाइंट्स: अक्षरधाम मेट्रो स्टेशन और उसके आसपास का ट्रैफिक अभी भी एक चुनौती है। शुरुआती कुछ किलोमीटर में आपको दोपहिया, तिपहिया और रोंग साइड (Wrong Side) चलने वाले वाहनों का सामना करना पड़ सकता है।
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    फिनिशिंग टच: दिल्ली से यूपी बॉर्डर (लोनी) तक के हिस्से में अभी भी कई जगह अंतिम चरण का काम चल रहा है। कहीं सड़कों के किनारे 'शोल्डर' भरे जा रहे हैं, तो कहीं स्ट्रक्चर को अंतिम मजबूती दी जा रही है। मजदूर दिन-रात एक करके इसे डेडलाइन तक पूरा करने में जुटे हैं।
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लोनी के बाद: असली रफ्तार

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जैसे ही आप गाजियाबाद के लोनी बॉर्डर को पार करेंगे, तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी। यहां से 6-लेन की चौड़ी और सपाट सड़क आपका स्वागत करेगी। लोनी के बाद का सफर 'मक्खन' जैसा है। यहां आपको न तो गड्ढे मिलेंगे और न ही बेवजह के ब्रेकर। यह हिस्सा पूरी तरह से 'एक्सेस कंट्रोल' है, यानी आपको बीच में कोई रुकावट नहीं मिलेगी।
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किसानों का संघर्ष और सरकार का लचीलापन: कैसे बदला डिजाइन?

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इस एक्सप्रेसवे का निर्माण आसान नहीं था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो किसान आंदोलनों का गढ़ माना जाता है, वहां जमीन अधिग्रहण और निर्माण कार्य में कई चुनौतियां आईं। विशेष रूप से इस प्रोजेक्ट के दूसरे चरण (Phase 2) में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिले।
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गन्ना किसानों की मांग और ऊंचे अंडरपास

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लगभग 13,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना में सरकार को कई बार अपने ब्लूप्रिंट (Design) में बदलाव करना पड़ा।
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    मुजफ्फरनगर का मामला: मुजफ्फरनगर के करौंदा महाजन इलाके में किसानों ने निर्माण कार्य रोक दिया था। उनकी समस्या व्यावहारिक थी—इस क्षेत्र में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर होती है। किसानों का कहना था कि गन्ने से लदे उनके ट्रैक्टर और ट्रॉलियां सामान्य ऊंचाई के अंडरपास से नहीं निकल पाएंगे।
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    सरकार का फैसला: NHAI ने किसानों की बात मानी और अंडरपास की ऊंचाई को मानक से बढ़ाकर 5.5 मीटर करने का फैसला किया। इसके लिए सड़क के लेवल को 1 मीटर और ऊपर उठाना पड़ा। यह दिखाता है कि विकास और स्थानीय जरूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाया गया।
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सहारनपुर और शामली का विरोध

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    बादगांव इंटरचेंज: सहारनपुर के बादगांव में भी स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया था। उनकी मांग थी कि एक्सप्रेसवे उनके इलाके से गुजर रहा है, तो उन्हें इसका फायदा भी मिलना चाहिए। इसके बाद वहां एक अतिरिक्त इंटरचेंज (Interchange) बनाया गया, ताकि स्थानीय लोग एक्सप्रेसवे पर चढ़ और उतर सकें।
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    बिराल का पुल: मुजफ्फरनगर के बिराल इलाके में एक सिंचाई परियोजना आड़े आ रही थी, जिसके कारण एक महत्वपूर्ण पुल के निर्माण में देरी हुई। अब यह पुल लगभग तैयार है। इसके अलावा, पावर ग्रिड कॉरपोरेशन की हाई-टेंशन लाइनों को शिफ्ट करना भी एक बड़ा सिरदर्द था, जिसे अब सुलझा लिया गया है।
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इंजीनियरिंग का चमत्कार: 99% काम पूरा

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भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के अधिकारियों के अनुसार, कॉरिडोर के चारों चरणों का औसतन 99 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है।
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    डेडलाइन: जो 1% काम बचा है, वह मुख्य रूप से पेंटिंग, साइनेज (Signage), और सौंदर्यीकरण का है। इसे अगले 7-10 दिनों में पूरा कर लिया जाएगा।
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    राइड क्वालिटी (Ride Quality): जो लोग दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे या ईस्टर्न पेरिफेरल पर सफर कर चुके हैं, वे जानते हैं कि कई बार जल्दी में बनाई गई सड़कों पर गाड़ी उछलती है। लेकिन इस कॉरिडोर पर ऐसा नहीं होगा। NHAI ने समझदारी दिखाते हुए सड़क की 'लेइंग' (Laying) पिछले मॉनसून से पहले ही कर दी थी। इससे सड़क को सेट होने (Settling) का पूरा समय मिल गया। अब इस पर गाड़ी चलाने का अनुभव बेहद स्मूथ होगा।
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चार चरणों (Phases) का पूरा ब्यौरा
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यह पूरा कॉरिडोर चार अलग-अलग चरणों में बांटा गया है, जो अलग-अलग चुनौतियों और विशेषताओं के साथ आते हैं:
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    चरण 1 (दिल्ली से EPE): यह हिस्सा अक्षरधाम से शुरू होकर ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे (बागपत के पास) तक जाता है। यह 31.6 किलोमीटर लंबा है। यह एक 'ब्राउनफील्ड' (Brownfield) प्रोजेक्ट है, यानी पुरानी सड़क को ही सुधारकर और एलिवेटेड बनाकर इसे 6-लेन किया गया है।
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    चरण 2 (बागपत से सहारनपुर): यह सबसे लंबा हिस्सा है—करीब 120 किलोमीटर। यह बागपत के EPE इंटरचेंज से शुरू होकर सहारनपुर बाईपास तक जाता है। यह पूरी तरह से 'ग्रीनफील्ड' (Greenfield) है, यानी खेतों के बीच से नई सड़क निकाली गई है। यह शामली और मुजफ्फरनगर के जिलों से होकर गुजरता है।
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    चरण 3 (सहारनपुर से गणेशपुर): यह 42 किलोमीटर का हिस्सा सहारनपुर बाईपास से उत्तराखंड के गणेशपुर तक जाता है। यह हिस्सा पूरी तरह बनकर तैयार है और ट्रायल के लिए फिट है।
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    चरण 4 (गणेशपुर से देहरादून): यह सबसे महत्वपूर्ण और सुंदर हिस्सा है। 20 किलोमीटर के इस हिस्से में राजाजी नेशनल पार्क का क्षेत्र आता है। इसमें से लगभग 15-16 किलोमीटर हिस्सा एलिवेटेड है और बाकी टनल (सुरंग) के रूप में है।
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राजाजी नेशनल पार्क: वन्यजीवों के लिए एशिया का सबसे लंबा कॉरिडोर

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इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत इसका पर्यावरणीय संवेदनशीलता के साथ तालमेल है। कॉरिडोर का अंतिम हिस्सा उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क से होकर गुजरता है, जो हाथियों, तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों का घर है।
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इंजीनियरिंग और पर्यावरण का संतुलन

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    12 किमी लंबा एलिवेटेड रोड: जानवरों के मुक्त आवागमन (Free Movement) को सुनिश्चित करने के लिए यहां 12 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड रोड (खंभों पर टिकी सड़क) बनाया गया है। यह एशिया का सबसे बड़ा वाइल्डलाइफ कॉरिडोर एलिवेटेड रोड माना जा रहा है।
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    नीचे जंगल, ऊपर सड़क: सड़क को ऊपर उठाने का मकसद यह है कि नीचे हाथी और अन्य जानवर अपने प्राकृतिक रास्तों (Animal Corridors) से बिना किसी डर के गुजर सकें।
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    रात का अनुशासन: वन्यजीवों को गाड़ियों की हेडलाइट से परेशानी न हो, इसके लिए विशेष नॉइस बैरियर (Noise Barriers) और लाइट बैरियर लगाए गए हैं।
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    निर्माण की शर्तें: नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ ने सख्त निर्देश दिए थे कि सूरज ढलने के बाद और सूरज उगने से पहले निर्माण कार्य नहीं होगा। इसके अलावा, मॉनसून में नदी के तेज बहाव के कारण काम रोका गया। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, NHAI ने इसे समय पर पूरा किया है।
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टोल टैक्स का गणित: सस्ता या महंगा?

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एक्सप्रेसवे के खुलने की खबर के साथ ही लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल 'टोल टैक्स' को लेकर है। क्या यह सफर जेब पर भारी पड़ेगा?
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    फास्टैग (FASTag) और एनुअल पास: अगर आप इस रूट पर नियमित यात्री हैं और आपके पास FASTag का एनुअल पास (Local Pass) है, तो यह सफर आपके लिए बेहद सस्ता होगा। चार टोल प्लाजा पार करने का खर्च महज 60 रुपये (अनुमानित पास धारकों के लिए प्रति ट्रिप औसत) आ सकता है।
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    आम यात्री: जिनके पास पास नहीं है, उन्हें दिल्ली से देहरादून तक के सफर के लिए एक तरफ का लगभग 500 से 550 रुपये टोल चुकाना पड़ सकता है।
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    तुलना: वर्तमान में भी अगर आप मेरठ-मुजफ्फरनगर-रूडकी वाले पुराने रास्ते से जाते हैं, तो भी आपको कई जगह टोल देना पड़ता है। नए कॉरिडोर पर समय और ईंधन की बचत को देखते हुए यह टोल वसूलने लायक लगेगा।
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आर्थिक प्रभाव: पर्यटन, कृषि और रियल एस्टेट

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यह कॉरिडोर सिर्फ एक 'रास्ता' नहीं, बल्कि 'अर्थव्यवस्था का इंजन' साबित होगा।
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पर्यटन (Tourism) को बूस्ट

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    वीकेंड डेस्टिनेशन: अभी तक दिल्ली के लोगों को देहरादून या मसूरी जाने के लिए कम से कम 3 दिन की छुट्टी चाहिए होती थी (आने-जाने में ही 12-14 घंटे खराब होते थे)। अब 2.5 घंटे के सफर का मतलब है कि लोग शनिवार सुबह जाकर रविवार शाम को वापस आ सकते हैं।
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    नए डेस्टिनेशन: हरिद्वार, ऋषिकेश, राजाजी पार्क और चकराता जैसे पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की बाढ़ आने वाली है। होटल और होम-स्टे बिजनेस में उछाल आएगा।
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कृषि और व्यापार (Agriculture & Trade)

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    गन्ना बेल्ट: पश्चिमी यूपी (बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर) गन्ने और सब्जियों का बड़ा उत्पादक है। अब किसान अपनी उपज को महज 1-2 घंटे में दिल्ली की आजादपुर मंडी या गाजियाबाद तक पहुंचा सकेंगे। ताजी सब्जियों के अच्छे दाम मिलेंगे।
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    वुड कार्विंग (काष्ठ कला): सहारनपुर अपनी लकड़ी की नक्काशी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। बेहतर कनेक्टिविटी से यहां के निर्यातकों को अपना माल दिल्ली एयरपोर्ट या पोर्ट तक पहुंचाने में आसानी होगी।
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रियल एस्टेट (Real Estate)

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देहरादून, हरिद्वार और सहारनपुर में जमीन के दाम पहले ही बढ़ने लगे हैं। दिल्ली के लोग अब देहरादून में 'सेकंड होम' या 'हॉलिडे होम' लेने में अधिक रुचि दिखाएंगे, क्योंकि अब वहां पहुंचना गुड़गांव या नोएडा के किसी दूरदराज इलाके में जाने जैसा आसान हो गया है।
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भविष्य की योजनाएं: कनेक्टिविटी का विस्तार

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NHAI यहीं रुकने वाला नहीं है। इस कॉरिडोर को आधार बनाकर आगे की कनेक्टिविटी को भी सुधारा जा रहा है।
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    मसूरी कनेक्टिविटी: देहरादून तक पहुंचने के बाद, मसूरी जाने वाले जाम से बचने के लिए एक नई टनल और बाईपास की योजना पर काम चल रहा है।
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    पांवटा साहिब और हिमाचल: इस कॉरिडोर को हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब और नाहन से जोड़ने के लिए भी नई सड़कों का खाका तैयार किया जा रहा है। इसका मतलब है कि आने वाले सालों में हिमाचल जाना भी दिल्लीवालों के लिए आसान हो जाएगा।
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यात्रा की सोच बदलने वाला प्रोजेक्ट

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दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की एक जीती-जागती मिसाल है। यह परियोजना बताती है कि अगर सही नीयत और तकनीक का इस्तेमाल किया जाए, तो विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं। किसानों की नाराजगी को सुलझाना, वन्यजीवों के लिए रास्ता छोड़ना और रिकॉर्ड समय में निर्माण पूरा करना—यह सब काबिले तारीफ है।
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फरवरी में जब पहली गाड़ी इस एक्सप्रेसवे पर सरपट दौड़ेगी, तो वह सिर्फ एक गाड़ी नहीं होगी, बल्कि वह एक बदलते हुए भारत की तस्वीर होगी—जहाँ दूरियां सिमट रही हैं और संभावनाएं फैल रही हैं।
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तो अपनी गाड़ियों में तेल भरवा लीजिए और फास्टैग रिचार्ज कर लीजिए, क्योंकि पहाड़ अब आपको बुला रहे हैं—और इस बार वे ज्यादा दूर नहीं हैं!
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तुलनात्मक विश्लेषण: पुराना रास्ता बनाम नया कॉरिडोर

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विशेषता
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पुराना रूट (वाया मेरठ-मुजफ्फरनगर-रूडकी)
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नया कॉरिडोर (इकोनॉमिक कॉरिडोर)
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दूरी
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लगभग 235 - 250 किमी
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210 किमी
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समय
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6 से 7 घंटे (जाम मिलने पर 8 घंटे)
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2.5 से 3 घंटे
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ट्रैफिक
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भारी (ट्रक, ट्रैक्टर, स्थानीय वाहन)
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एक्सेस कंट्रोल (सिर्फ तेज वाहन)
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सड़क प्रकार
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मिक्स (हाइवे + शहरी सड़कें)
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6-लेन/12-लेन एलिवेटेड
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बाधाएं
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मोदीनगर, खतौली, रूडकी का जाम
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कोई जाम नहीं (नॉन-स्टॉप)
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वन्यजीव सुरक्षा
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नगण्य (दुर्घटना का खतरा)
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एलिवेटेड रोड और अंडरपास
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महत्वपूर्ण तथ्य एक नजर में (Fast Facts)

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    कुल लागत: लगभग 13,000 करोड़ रुपये।
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    शुरुआत: अक्षरधाम, दिल्ली।
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    अंत: देहरादून, उत्तराखंड।
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    गति सीमा: कार - 100 किमी/घंटा, भारी वाहन - 80 किमी/घंटा।
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    खासियत: एशिया का सबसे बड़ा वाइल्डलाइफ एलिवेटेड कॉरिडोर (12 किमी)।
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    लाभान्वित राज्य: दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड।
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