अगर आप भी उन वाहन मालिकों में से हैं जो प्रदूषण जांच (PUC) या फिटनेस सर्टिफिकेट बनवाने के लिए एजेंट को फोन करते थे और घर बैठे सर्टिफिकेट व्हाट्सएप पर मंगा लेते थे, तो आपके लिए बुरी खबर है। 'जुगाड़' का यह युग अब समाप्त होने वाला है। केंद्र सरकार और सड़क परिवहन मंत्रालय (MoRTH) ने फर्जीवाड़े पर नकेल कसने और प्रदूषण को जड़ से खत्म करने के लिए मोटर व्हीकल नियमों में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर ली है।READ ALSO:-मेरठ में 'शीत लहर' का टॉर्चर: घने कोहरे और बर्फीली हवाओं के आगे प्रशासन ने टेके घुटने, 12वीं तक के सभी स्कूलों में 5 जनवरी तक 'ताला', आदेश न मानने वालों पर होगी कार्रवाई
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प्रस्तावित नए नियमों के तहत, अब आपकी गाड़ी का फिटनेस टेस्ट किसी डॉक्टर के चेकअप से कम नहीं होगा। इसमें पारदर्शिता लाने के लिए टेक्नोलॉजी का भरपूर इस्तेमाल किया जाएगा। ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया है, और अगर यह लागू हुआ, तो केवल वही गाड़ियां सड़कों पर दौड़ेंगी जो वास्तव में फिट हैं। बाकी गाड़ियां सीधे कबाड़ (Scrap) में जाएंगी।
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खत्म होगा 'कागजी' फिटनेस का खेल

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अब तक देश के कई हिस्सों में यह 'ओपन सीक्रेट' था कि कुछ पैसों के बदले बिना गाड़ी दिखाए ही फिटनेस और पीयूसी सर्टिफिकेट बन जाते थे। लेकिन परिवहन मंत्रालय के नए प्रस्ताव ने इस सिस्टम की कमर तोड़ने की योजना बना ली है।
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अनिवार्य होगी फिजिकल उपस्थिति

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नए नियमों के मुताबिक, बिना वाहन को टेस्ट सेंटर ले जाए, सर्टिफिकेट जारी करना अब असंभव होगा। चाहे कमर्शियल वाहन हो या निजी (Private), अब हर गाड़ी को फिजिकली टेस्ट सेंटर पर मौजूद रहना होगा। मंत्रालय का स्पष्ट मानना है कि वायु प्रदूषण की बिगड़ती स्थिति और सड़कों पर दौड़ती खटारा गाड़ियों के पीछे मुख्य कारण फर्जी पीयूसी सर्टिफिकेट हैं।
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ऑटोमेटेड टेस्ट स्टेशन (ATS) की एंट्री

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अभी तक फिटनेस टेस्ट मैनुअल होते थे, जहां इंस्पेक्टर की मर्जी या 'सेटिंग' चल जाती थी।
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    अब निजी वाहनों (Private Vehicles) के लिए भी ऑटोमेटेड टेस्ट अनिवार्य करने का प्रस्ताव है।
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    इसका मतलब है कि मशीनों द्वारा गाड़ी की जांच होगी। ब्रेक, इंजन, उत्सर्जन, हेडलाइट और स्टीयरिंग की जांच कंप्यूटराइज्ड होगी, जिसमें हेराफेरी की गुंजाइश न के बराबर होगी।
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    रिपोर्ट के मुताबिक, अभी देश में 160 से ज्यादा ऑटोमेटेड टेस्ट स्टेशन (ATS) काम कर रहे हैं, और इनकी संख्या बढ़ाई जा रही है।
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'बिग बॉस' स्टाइल में होगी निगरानी - वीडियो सबूत जरूरी

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इस पूरे बदलाव का सबसे हाई-टेक और दिलचस्प पहलू है- वीडियो रिकॉर्डिंग (Video Evidence)। सरकार अब कागजों पर भरोसा नहीं करेगी, उसे आंखों देखा सबूत चाहिए।
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10 सेकंड का जियो-टैग वीडियो

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ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के अनुसार, फिटनेस सर्टिफिकेट तभी रिन्यू या जारी होगा, जब टेस्ट सेंटर द्वारा वाहन का एक वीडियो पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा।
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    समय: वीडियो कम से कम 10 सेकंड का होना चाहिए।
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    जियो-टैग (Geo-tagged): वीडियो में लोकेशन की जानकारी (GPS कोर्डिनेट्स) होनी चाहिए, जिससे यह साबित हो सके कि गाड़ी वास्तव में टेस्ट सेंटर पर मौजूद थी।
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    क्या दिखाना होगा?: इस छोटे से वीडियो में कैमरामैन को वाहन को आगे, पीछे, दाएं और बाएं (360 डिग्री व्यू) से दिखाना होगा।
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    पहचान: वीडियो में गाड़ी की नंबर प्लेट, चेसिस नंबर और इंजन नंबर साफ-साफ नजर आने चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि जिस गाड़ी का सर्टिफिकेट बन रहा है, टेस्ट उसी का हुआ है।
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यह नियम उन फर्जीवाड़ों को रोकने के लिए है जहां पुरानी तारीखों में सर्टिफिकेट बनाए जाते थे या एक गाड़ी की जगह दूसरी गाड़ी का टेस्ट दिखा दिया जाता था।
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15 साल पुरानी कारों पर विशेष नजर

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सरकार का मुख्य फोकस उन निजी वाहनों पर है जो 15 साल की उम्र पार कर चुके हैं। नियम कहते हैं कि 15 साल बाद निजी वाहनों का रजिस्ट्रेशन रिन्यू (RC Renewal) कराना होता है।
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नए प्रस्ताव के तहत:

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    15 साल से पुराने निजी वाहनों को रिन्यूअल के लिए फिटनेस टेस्ट से गुजरना ही होगा।
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    यह टेस्ट अब सड़क किनारे किसी मैकेनिक के पास नहीं, बल्कि ऑटोमेटेड टेस्ट स्टेशन (ATS) पर होगा।
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    एक बार पास होने के बाद, अगले 5 साल के लिए सर्टिफिकेट मिलेगा, जिसके बाद फिर से टेस्ट कराना होगा।
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अधिकारियों का कहना है कि इससे पारदर्शिता आएगी और सिर्फ वही पुरानी गाड़ियां सड़कों पर रहेंगी जो पर्यावरण और सुरक्षा के मानकों पर खरी उतरती हैं।
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फेल हुए तो क्या? - 180 दिन का अल्टीमेटम

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सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर ऑटोमेटेड टेस्ट में आपकी प्यारी पुरानी कार फेल हो गई, तो क्या होगा? क्या उसे तुरंत जब्त कर लिया जाएगा? नहीं, सरकार ने इसके लिए भी नियम तय किए हैं।
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सुधरने का मौका

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अगर कोई वाहन फिटनेस टेस्ट में फेल हो जाता है, तो मालिक को उसे ठीक (Repair) कराने का मौका दिया जाएगा।
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    समय सीमा: वाहन मालिक को 180 दिन (6 महीने) का समय मिलेगा।
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    दोबारा टेस्ट: रिपेयर कराने के बाद, 180 दिनों के भीतर गाड़ी को दोबारा टेस्ट के लिए लाना होगा।
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ELV (End of Life Vehicle) का खतरा

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यहीं पर नियम सख्त हो जाते हैं। अगर 180 दिनों के बाद भी वाहन दोबारा टेस्ट में पास नहीं होता, या मालिक उसे ठीक नहीं कराता, तो उसे End of Life Vehicle (ELV) घोषित कर दिया जाएगा।
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    वाहन डेटाबेस में एंट्री: 'वाहन' (Vahan) पोर्टल पर उस गाड़ी के आगे ELV का ठप्पा लग जाएगा।
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    परिणाम: ELV घोषित होने के बाद वह गाड़ी न तो सड़क पर चल सकेगी, न बेची जा सकेगी और न ही उसका ट्रांसफर होगा। वह कानूनी रूप से 'कचरा' मान ली जाएगी जिसे स्क्रैप करना ही एकमात्र विकल्प बचेगा।
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फीस देकर तारीख बढ़ाने का 'खेल खत्म'

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अब तक एक लूपहोल (कमी) यह था कि अगर गाड़ी अनफिट भी है, तो कई बार लोग सिर्फ फीस या जुर्माना भरकर समय सीमा बढ़वा लेते थे।
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अधिकारी का बयान: रिपोर्ट में अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि नए नियम इस कमी को पूरी तरह खत्म कर देंगे। एक अधिकारी ने स्पष्ट कहा, "अब ऐसा नहीं होगा। सिर्फ फीस देकर समय नहीं बढ़ेगा। पहली बार वाहन के अनफिट घोषित होने के बाद 180 दिन के अंदर फिटनेस सर्टिफिकेट लेना ही होगा। यह 'करो या मरो' वाली स्थिति होगी।"
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यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी ATS (टेस्ट स्टेशन) गलत रिपोर्ट न दे। अगर कोई सेंटर गड़बड़ी करता पकड़ा गया, तो उसका लाइसेंस रद्द करने के साथ भारी जुर्माने का प्रावधान भी रखा जा सकता है।
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स्वच्छ हवा और सुरक्षित सड़कों की ओर कदम

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सड़क परिवहन मंत्रालय का यह कदम सख्त जरूर लग सकता है, लेकिन भारत के बढ़ते प्रदूषण स्तर और सड़क हादसों को देखते हुए यह वक्त की मांग है। दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण अनफिट वाहन हैं जो मानक से कई गुना ज्यादा धुआं छोड़ते हैं।
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वाहन मालिकों के लिए अब जरूरी है कि वे अपनी गाड़ियों के रखरखाव (Maintenance) पर ध्यान दें। अगर आपकी गाड़ी 15 साल पुरानी होने वाली है, तो तैयार हो जाइए- अब आपकी गाड़ी को मशीनों और कैमरों की अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा।
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खबरीलाल की राय: "जुगाड़ टेक्नोलॉजी" भारत की पहचान रही है, लेकिन सुरक्षा और पर्यावरण के मामले में यह जुगाड़ अब भारी पड़ सकता है। यह नियम लागू होने के बाद दलालों की दुकानें बंद होंगी और सिस्टम पारदर्शी बनेगा। हमारी सलाह है कि अपनी गाड़ी के पेपर और इंजन, दोनों दुरुस्त रखें।
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