दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार को लेकर चल रहे विवाद पर 'गो स्पिरिचुअल' के संस्थापक सोनू त्यागी ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि हिंदू और सनातन धर्म का मूल संदेश अहिंसा है। शाकाहार को दबाव से नहीं, बल्कि जागरूकता और प्रेम से अपनाना चाहिए।
दुर्गा पूजा मांसाहार विवाद पर सोनू त्यागी का बयान
दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन को लेकर, विशेषकर पश्चिम बंगाल में चल रही बहस के बीच 'गो स्पिरिचुअल' और 'अप्रोच एंटरटेनमेंट' के संस्थापक सोनू त्यागी ने बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को राजनीति और क्षेत्रीय विवाद से ऊपर उठकर हिंदू अध्यात्म, सनातन मूल्यों और पशुओं के प्रति करुणा के नजरिए से देखा जाना चाहिए। त्यागी ने स्पष्ट किया कि भारत की विविध धार्मिक व सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान होना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही हमें अध्यात्म के असली उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिए।

अध्यात्म का अर्थ करुणा और अहिंसा
Follow the Khabreelal News channel on WhatsApp Join ›सोनू त्यागी ने कहा, "हिंदू अध्यात्म हमें करुणा सिखाता है। जब हम देवी मां की पूजा करते हैं, तो सभी जीवों के प्रति दया क्यों नहीं दिखा सकते?" उन्होंने कहा कि इतिहास में अलग-अलग समय और क्षेत्रों में खान-पान की आदतें अलग रही हैं, लेकिन धर्म हमें यह सोचने की प्रेरणा देता है कि हमें कैसा इंसान बनना चाहिए। हिंदू और सनातन परंपराओं में सात्विक भोजन का हमेशा से महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि किसी भी पशु का जीवन हमारे कुछ पलों के स्वाद से कहीं ज्यादा कीमती है।
शाकाहार थोपने का विषय नहीं
इस पूरी बहस में संतुलन बनाते हुए सोनू त्यागी ने कहा कि शाकाहार को कभी अहंकार या खुद को दूसरों से बेहतर समझने का कारण नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने शाकाहार को किसी पर जबरदस्ती थोपने का भी कड़ा विरोध किया। उनके अनुसार, "हम शाकाहार की बात करते हैं, उसे थोपते नहीं हैं। खाने की कोई बहस इस बात का सर्टिफिकेट नहीं बननी चाहिए कि कौन हिंदू या सनातनी है और कौन नहीं।" त्यागी ने कहा कि भारत को भोजन पर एक और गुस्से वाली बहस की नहीं, बल्कि करुणा और समझदारी से भरी बातचीत की जरूरत है।
कौन हैं सोनू त्यागी?
सोनू त्यागी एक जाने-माने अवार्ड-विनिंग लेखक, निर्देशक और निर्माता हैं। उनकी संस्था 'गो स्पिरिचुअल' अपने 'गो वेज' अभियान के जरिए समाज में शाकाहार, अहिंसा और पशु करुणा को बढ़ावा दे रही है। उनका साफ मानना है कि सच्चा अध्यात्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी करुणा का दायरा बढ़ाता है।
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