नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अगर एक शिक्षित और स्वतंत्र महिला अपनी मर्जी से किसी शादीशुदा पुरुष के साथ संबंध रखती है, तो वह बाद में यह दावा नहीं कर सकती कि उसे गुमराह किया गया था या उसका शोषण हुआ। कोर्ट ने इस तरह के मामलों में वयस्कों को अपने निर्णयों की जिम्मेदारी लेने की बात कही है।READ ALSO:-देश को मिला नया उपराष्ट्रपति: CP राधाकृष्णन जीते, INDIA ब्लॉक के सुदर्शन रेड्डी को मिले 300 वोट
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हाईकोर्ट ने यह फैसला एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज FIR को खारिज करते हुए सुनाया। शिकायतकर्ता महिला ने उस व्यक्ति पर शादी का झांसा देकर यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया था।
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'रिश्ता टूटने पर लगाए जाते हैं रेप के आरोप'
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न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने इस मामले को खारिज करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता को पता था कि आरोपी पहले से शादीशुदा है, फिर भी उसने स्वेच्छा से उसके साथ यौन संबंध बनाए। कोर्ट ने कहा कि ये परिस्थितियाँ साबित करती हैं कि दोनों के बीच का संबंध सहमति से था, न कि शादी के झूठे वादे से प्रेरित।
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जस्टिस शर्मा ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि न्याय प्रणाली अक्सर ऐसे मामलों से बोझिल हो जाती है, जहाँ लंबे समय तक सहमति से बने रिश्ते के टूटने के बाद झूठे वादों के आधार पर रेप के आरोप लगाए जाते हैं। उन्होंने कहा कि यौन अपराधों का कानून महिलाओं को जबरन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया है, न कि असफल सहमति वाले रिश्तों में एक हथियार के रूप में इस्तेमाल होने के लिए।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी जिक्र
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हाईकोर्ट के इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कुछ अन्य फैसलों का भी जिक्र किया गया:
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    शादीशुदा जोड़े: सुप्रीम कोर्ट ने 21 अगस्त को कहा था कि एक शादीशुदा जोड़े के लिए अलग रहना असंभव है। अगर कोई अलग रहना चाहता है तो उसे शादी ही नहीं करनी चाहिए।
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    हिंदू विवाह: एक अन्य फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह कोई नाच-गाने या व्यापारिक लेनदेन नहीं है। जब तक इसमें रस्में नहीं निभाई जातीं, तब तक इसे वैध नहीं माना जा सकता।
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कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि हर असफल रिश्ते को रेप के मामले में बदलना न केवल न्याय के सिद्धांत के खिलाफ होगा, बल्कि रेप कानून की मूल भावना और उद्देश्य के भी विपरीत होगा। यह कानून उन मामलों में हथियार बनने के लिए नहीं बनाया गया है, जहाँ दो वयस्क आपसी सहमति से अलग होते हैं।
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