देश भर में महंगाई के बीच आम जनता को राहत देने के लिए चलाई जा रही प्रमुख योजनाओं में से एक 'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना' (Pradhan Mantri Ujjwala Yojana - PMUY) के नियमों में एक बड़ा बदलाव किया गया है। पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से जारी की गई हालिया जानकारी ने स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा असर अब भारतीय उपभोक्ताओं की रसोई तक पहुंचने लगा है।READ ALSO:-कुदरत का रौद्र रूप: 9 जून को देश के 15 राज्यों में आंधी-तूफान का महासंकट, 90 किमी/घंटे की रफ्तार से कांपेगा उत्तर-पूर्वी भारत, IMD की सख्त चेतावनी
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सोमवार को पेट्रोलियम मंत्रालय के एडिशनल सेक्रेटरी प्रवीण खनूजा ने एक अहम प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि सरकार ने उज्ज्वला योजना के तहत दी जाने वाली एलपीजी सब्सिडी (LPG Subsidy) की सीमा को घटा दिया है।
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उज्ज्वला योजना (PMUY) के नए नियम और कीमतों का गणित

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अब तक उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को एक वित्तीय वर्ष में 9 गैस सिलेंडरों पर 300 रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी प्रदान की जाती थी। यह सब्सिडी सीधे उनके बैंक खातों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से जमा की जाती है। लेकिन नए नियमों के तहत अब यह 300 रुपये की छूट केवल साल के पहले 4 एलपीजी सिलेंडरों पर ही मिलेगी।
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दिल्ली में मौजूदा कीमतों का विश्लेषण:

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    रविवार, 7 जून को घरेलू एलपीजी सिलेंडर (14.2 किलोग्राम) की कीमतों में 29 रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
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    इस बढ़ोतरी के बाद देश की राजधानी दिल्ली में बिना सब्सिडी वाले घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 942 रुपये हो गई है।
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    उज्ज्वला योजना के जिन लाभार्थियों को 300 रुपये की सब्सिडी मिलेगी, उनके लिए यह गैस सिलेंडर 642 रुपये का पड़ेगा।
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    पांचवें सिलेंडर से लाभार्थियों को बाजार मूल्य यानी 942 रुपये ही चुकाने होंगे।
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क्यों लेना पड़ा सरकार को यह कड़ा फैसला?

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इस फैसले के पीछे कोई स्थानीय या घरेलू कारण नहीं है, बल्कि पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय बाजार का संकट जिम्मेदार है। वर्तमान समय में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा छद्म युद्ध और पश्चिम एशिया (Middle East) में गहराता तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। इन भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और एलपीजी गैस की कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।
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सऊदी LPG बेंचमार्क में 46% का भारी उछाल

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भारत अपनी कुल घरेलू एलपीजी जरूरतों का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। भारत में आयात होने वाली गैस की लागत 'सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस' (Saudi CP) द्वारा निर्धारित होती है। इसे सऊदी अरामको (Saudi Aramco) नामक कंपनी हर महीने की शुरुआत में तय करती है।
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    फरवरी के महीने में एलपीजी का सऊदी सीपी बेंचमार्क लगभग 543 डॉलर प्रति टन पर था।
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    जून आते-आते यह आंकड़ा बेतहाशा बढ़कर 790 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गया है।
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    यानी संकट शुरू होने के बाद से अब तक अंतरराष्ट्रीय एलपीजी बेंचमार्क में 46% की भारी वृद्धि हो चुकी है।
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    इस वैश्विक तेजी के कारण प्रोपेन गैस 39% और ब्यूटेन गैस 52% तक महंगी हो गई है।
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तेल कंपनियों का कमरतोड़ घाटा: 1600 पार हुई वास्तविक लागत

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अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतें बढ़ने का सीधा असर भारतीय तेल विपणन कंपनियों (OMCs) पर पड़ रहा है। एडिशनल सेक्रेटरी ने स्पष्ट किया कि गैस की लैंडिंग लागत, रिफाइनिंग और वितरण को मिलाकर एक 14.2 किलो वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की वास्तविक लागत (Real Cost) 1600 रुपये को पार कर चुकी है।
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'अंडर-रिकवरी' का बढ़ता बोझ: जब तेल कंपनियां 1600 रुपये की लागत वाला सिलेंडर आम जनता को 942 रुपये (या उज्ज्वला के तहत 642 रुपये) में बेचती हैं, तो इस बिक्री मूल्य और लागत मूल्य के बीच के अंतर को वित्तीय भाषा में 'अंडर-रिकवरी' (Under-Recovery) कहा जाता है।
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    वर्तमान में तेल कंपनियों को प्रत्येक घरेलू सिलेंडर की बिक्री पर लगभग 700 रुपये का भारी नुकसान हो रहा है।
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    पिछले वित्तीय वर्ष के अंत तक घरेलू एलपीजी पर तेल कंपनियों का यह कुल घाटा (अंडर-रिकवरी) बढ़कर 60,000 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया, जो इसके पिछले साल 41,338 करोड़ रुपये था।
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    इस विशाल वित्तीय संकट से कंपनियों को उबारने के लिए केंद्रीय कैबिनेट ने हाल ही में 30,000 करोड़ रुपये के सरकारी मुआवजे को मंजूरी दी है। यह राहत राशि ग्राहकों को मिलने वाली सब्सिडी के अतिरिक्त है।
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पेट्रोल-डीजल पर हर दिन 600-700 करोड़ का नुकसान

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पेट्रोलियम मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार संकट केवल रसोई गैस तक सीमित नहीं है। परिवहन ईंधन (Transport Fuel) पर भी भारी नुकसान दर्ज किया जा रहा है।
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    वर्तमान में तेल कंपनियों को डीजल की बिक्री पर 30 रुपये प्रति लीटर का नुकसान झेलना पड़ रहा है।
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    पेट्रोल की बिक्री पर 6 रुपये प्रति लीटर का नुकसान (अंडर-रिकवरी) हो रहा है।
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    इस भारी अंतर के कारण भारतीय तेल कंपनियों को हर दिन करीब 600 से 700 करोड़ रुपये का दैनिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
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हाल ही के हफ्तों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुल मिलाकर 7.50 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की गई है, जबकि सीएनजी (CNG) भी करीब 6 रुपये प्रति किलो महंगी हुई है। इसके बावजूद, तेल कंपनियों का दावा है कि पेट्रोल और डीजल को अभी भी उनकी वास्तविक लागत से काफी कम कीमत पर बेचा जा रहा है। सरकार अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हुई पूरी बढ़ोतरी का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर नहीं डाल रही है।
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होर्मुज स्ट्रेट का संकट और भारत की सप्लाई चेन

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इस पूरे संकट का एक प्रमुख केंद्र 'होर्मुज स्ट्रेट' (Strait of Hormuz) है। क्या है होर्मुज स्ट्रेट? यह फारस की खाड़ी (Persian Gulf) और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित एक बेहद संकरा और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री जलमार्ग है। दुनिया के कुल पेट्रोलियम व्यापार का लगभग 20% और भारत का 54% एलपीजी आयात इसी रास्ते से होकर गुजरता है। इसे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का सबसे संवेदनशील रूट माना जाता है।
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फरवरी के अंत में पश्चिम एशिया में तनाव के चलते होर्मुज स्ट्रेट का मार्ग आंशिक रूप से बाधित हो गया था। इस मार्ग पर संघर्ष के कारण जहां दुनिया के कई देशों का कॉमर्शियल ट्रैफिक पूरी तरह से रुक गया, वहीं भारत ने अपनी बेहतरीन कूटनीति और बेहतर तालमेल के जरिए अपने जहाजों की आवाजाही को निर्बाध रूप से जारी रखा। भारतीय झंडे वाले टैंकरों ने लगातार इस खतरे वाले रास्ते से कच्चे तेल और एलपीजी की खेप लेकर भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच सुनिश्चित की, जिससे देश में किसी भी पेट्रोलियम प्रोडक्ट की भारी किल्लत नहीं हुई।
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संकट से निपटने के लिए भारत सरकार के ऐतिहासिक कदम

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आपूर्ति को सुरक्षित रखने और अंतरराष्ट्रीय निर्भरता को कम करने के लिए भारत सरकार ने कई युद्धस्तर के कदम उठाए हैं:
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    घरेलू उत्पादन में वृद्धि: भारत ने अपने घरेलू एलपीजी उत्पादन को 60% से अधिक बढ़ाते हुए इसे करीब 32 टीएमटी (TMT) से 52 टीएमटी तक पहुंचा दिया है।
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    नए बाजारों की तलाश: केवल मध्य पूर्व पर निर्भर रहने के बजाय, होर्मुज रूट के बाहर के देशों जैसे अमेरिका, कनाडा और अल्जीरिया से भी गैस की खरीद शुरू कर दी गई है।
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    प्राथमिकता आपूर्ति (Priority Users): सीमित आपूर्ति के दौर में घरों के साथ-साथ अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों को गैस सप्लाई में सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
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    कालाबाजारी पर रोक: घरेलू गैस की कॉमर्शियल मार्केट में होने वाली चोरी और दुरुपयोग को रोकने के लिए ओटीपी (OTP) आधारित डिलीवरी वेरिफिकेशन को कड़ाई से लागू करते हुए इसे 90% तक बढ़ा दिया गया है।
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    पीएनजी (PNG) को बढ़ावा: एलपीजी सिलेंडर पर मांग का दबाव कम करने के लिए शहरी क्षेत्रों के ग्राहकों को पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) का इस्तेमाल करने के लिए तेजी से प्रेरित किया जा रहा है।
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कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतें पहुंचीं आसमान पर

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जहां सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को भारी नुकसान उठाकर भी सस्ती गैस मुहैया करा रही है, वहीं होटल-रेस्टोरेंट और उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले 19 किलोग्राम के कॉमर्शियल सिलेंडर की कीमतें आसमान छू रही हैं। कॉमर्शियल सिलेंडर के दाम हर महीने अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क के आधार पर स्वतः (Automatically) बदलते हैं। पश्चिम एशिया संकट के दौरान लगातार 5 बार दाम बढ़ने के बाद, दिल्ली में 19 किलोग्राम का कॉमर्शियल गैस सिलेंडर अब 3,113.50 रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर बिक रहा है। इसका मतलब है कि कॉमर्शियल ग्राहकों को करीब 164 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से भुगतान करना पड़ रहा है, जबकि इसके विपरीत घरेलू उपभोक्ता केवल 66 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से भुगतान कर रहे हैं।
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एलपीजी गैस सिलेंडर की कीमत आखिर कैसे तय होती है?

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आम उपभोक्ताओं के मन में हमेशा यह सवाल रहता है कि गैस की कीमतें कैसे निर्धारित की जाती हैं। इसके मुख्य कारक निम्नलिखित हैं:
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    अंतरराष्ट्रीय बाजार: सबसे बड़ा फैक्टर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और एलपीजी की कीमतें (सऊदी सीपी) होती हैं।
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    रुपये-डॉलर का समीकरण: चूंकि हम गैस आयात करते हैं, इसलिए डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की मजबूती या कमजोरी का सीधा असर कीमत पर पड़ता है।
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    लॉजिस्टिक लागत: गैस के आयात, समुद्री ढुलाई, रिफाइनरी से बॉटलिंग प्लांट तक ले जाने का खर्च और अंततः डिस्ट्रीब्यूशन खर्च जोड़ा जाता है।
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    टैक्स और नीतियां: केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स, कस्टम ड्यूटी और सब्सिडी नीतियां अंतिम खुदरा मूल्य तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
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इस पूरी वैश्विक रिपोर्ट और आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद यह स्पष्ट होता है कि दुनिया भर में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में आए जबरदस्त भूचाल के बावजूद, भारतीय परिवारों को दुनिया की कई एडवांस इकोनॉमी (जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया) और पड़ोसी देशों के मुकाबले सबसे सस्ती कुकिंग गैस मिल रही है। हालांकि, उज्ज्वला योजना के तहत सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या 9 से घटाकर 4 करना यह दर्शाता है कि सरकारी खजाने और तेल कंपनियों पर अब वित्तीय बोझ अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है।
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आने वाले दिनों में यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज स्ट्रेट का संकट कम नहीं होता है, तो ऊर्जा क्षेत्र में भारत को और भी बड़ी रणनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। आम जनता को ऊर्जा संरक्षण और पीएनजी (PNG) जैसे वैकल्पिक ईंधनों की तरफ अपना रुझान बढ़ाना होगा।
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