भारत जैसे विशाल देश में, जहां आज भी एक बड़ी आबादी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए नकद लेन-देन पर निर्भर करती है, वहां से एक बेहद चिंताजनक और आम आदमी की परेशानी बढ़ाने वाली खबर सामने आ रही है। डिजिटल इंडिया की बढ़ती रफ्तार के बीच देश के छोटे शहरों (Tier-2), कस्बों (Tier-3) और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बैंकिंग उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा 'कैश संकट' खड़ा होने जा रहा है। आने वाले दिनों में इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर एटीएम (ATM) बंद हो सकते हैं। इस गंभीर स्थिति के कारण लोगों को अपने ही बैंक खाते से अपनी गाढ़ी कमाई की नकदी (कैश) निकालने के लिए दर-दर भटकना पड़ सकता है और भारी किल्लत का सामना करना पड़ सकता है।
\r\n\r\nइस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए एटीएम इंडस्ट्री की शीर्ष संस्था, कन्फेडरेशन ऑफ एटीएम इंडस्ट्री (CATMi) ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के समक्ष अपनी गहरी चिंता जताई है और हस्तक्षेप की मांग की है।
\r\n\r\nकैश न होने से मशीनें पड़ी हैं 'खाली डिब्बा', ऑपरेटर्स को भारी नुकसान
\r\n\r\nवर्तमान स्थिति यह है कि देश के कई छोटे शहरों और ग्रामीण अंचलों में लगे एटीएम में पर्याप्त मात्रा में नकदी नहीं पहुंच पा रही है। कैश न होने के कारण ये मशीनें लगातार ऑफलाइन (Offline) मोड में पड़ी हुई हैं। एटीएम का मुख्य उद्देश्य ही लोगों को 24 घंटे नकदी उपलब्ध कराना है, लेकिन जब मशीन में कैश ही नहीं होगा, तो वह एक खाली डिब्बे के समान रह जाती है।
\r\n\r\nएटीएम मशीनें बंद रहने या ऑफलाइन रहने से केवल आम जनता को ही परेशानी नहीं हो रही है, बल्कि एटीएम संचालित करने वाली कंपनियों (ATM Operators) की भी कमर टूट रही है। ऑपरेटर्स की कमाई का मुख्य जरिया ग्राहकों द्वारा किए गए लेन-देन (Transactions) पर मिलने वाली 'इंटरचेंज फीस' (Interchange Fee) होती है। जब एटीएम में कैश ही नहीं होगा और ग्राहक ट्रांजैक्शन नहीं कर पाएंगे, तो ऑपरेटर्स को मिलने वाली इस फीस का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है, जिससे उनका बिजनेस मॉडल खतरे में पड़ गया है।
\r\n\r\nसंकट की मुख्य वजह: टियर-1 (मेट्रो) शहरों पर SBI का अत्यधिक फोकस
\r\n\r\nइस पूरे कैश संकट के पीछे सबसे बड़ी वजह क्या है? एटीएम ऑपरेटर्स का स्पष्ट तौर पर कहना है कि देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), इस समस्या के केंद्र में है। आरोप है कि एसबीआई अपना पूरा ध्यान और नकदी का बड़ा हिस्सा टियर-1 (मेट्रो) शहरों के एटीएम में जरूरत से ज्यादा भेज रहा है। इस 'मेट्रो-फोकस' नीति के चलते टियर-2 और टियर-3 शहरों (छोटे शहरों और कस्बों) के एटीएम के लिए कैश की भारी कमी पैदा हो गई है।
\r\n\r\nआंकड़ों पर गौर करें तो पूरे देश में एसबीआई (SBI) के लगभग 65,000 एटीएम का विशाल नेटवर्क फैला हुआ है। बैंक अपने इस विशाल नेटवर्क के लगभग आधे हिस्से के लिए कैश की हैंडलिंग और मैनेजमेंट खुद ही करता है, और यह हिस्सा मुख्य रूप से बड़े मेट्रो शहरों में स्थित है।
\r\n\r\nनवभारत टाइम्स (NBT) की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, एटीएम इंडस्ट्री से जुड़ी एक प्रमुख कंपनी के सीईओ ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि देश के छोटे बैंक किसी तरह से ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में स्थिति को संभाल रहे हैं। लेकिन, देश के सबसे बड़े बैंक (SBI) का पूरा ध्यान अब केवल मेट्रो शहरों पर केंद्रित हो गया है। एसबीआई के इस एकतरफा रवैये से बाकी दूरदराज के इलाकों में कैश की सप्लाई चेन (Supply Chain) पूरी तरह से प्रभावित और अस्त-व्यस्त हो गई है।
\r\n\r\nचौतरफा दबाव में एटीएम इंडस्ट्री: क्यों बढ़ रहा है मशीनों को बंद करने का दबाव?
\r\n\r\nछोटे शहरों में एटीएम बंद होने की नौबत आने के पीछे केवल कैश की कमी ही एकमात्र कारण नहीं है। एटीएम इंडस्ट्री इस वक्त कई अन्य गंभीर आर्थिक और ढांचागत चुनौतियों का भी सामना कर रही है:
\r\n\r\n1. ऑपरेटिंग कॉस्ट (Operating Cost) में भारी उछाल:
\r\n\r\nएटीएम मशीनों को सुचारू रूप से चलाने के लिए भारी भरकम खर्च करना पड़ता है, जिसमें सुरक्षा गार्ड, कैश वैन, बिजली और रखरखाव शामिल है। ऑपरेटर्स का कहना है कि हाल के दिनों में न्यूनतम मजदूरी (Minimum Wage) में लगभग 60% तक की भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही, कैश को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाली बख्तरबंद गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन (फ्यूल/डीजल) की ऊंची कीमतों ने एटीएम के संचालन के कुल खर्च को आसमान पर पहुंचा दिया है। लागत बढ़ने और कमाई घटने से ऑपरेटर्स के लिए इन मशीनों को चालू रख पाना घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
\r\n\r\n2. कैश निकासी में लगातार भारी गिरावट:
\r\n\r\nएक तरफ जहां मशीनों को चलाने का खर्च (Operating Cost) लगातार बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ डिजिटल पेमेंट्स (UPI आदि) के बढ़ते चलन के कारण एटीएम से कैश निकालने वाले लोगों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है। अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है:
\r\n\r\nजनवरी 2023 में देश भर के एटीएम से कुल 570 मिलियन (57 करोड़) बार कैश निकाला गया था।
\r\n\r\nसितंबर 2025 तक आते-आते यह आंकड़ा बुरी तरह लुढ़ककर महज 439.5 मिलियन (43.95 करोड़) तक ही सीमित रह गया है।
\r\n\r\nलेन-देन की संख्या घटने का सीधा असर ऑपरेटर्स के मुनाफे पर पड़ रहा है।
\r\n\r\nलगातार गिर रहा है एटीएम का ग्राफ (सांख्यिकीय विश्लेषण)
\r\n\r\nमुनाफे में भारी कमी, लगातार बढ़ते खर्चे और कैश सप्लाई में आ रही रुकावटों के कारण देश में एटीएम मशीनों का कुल ग्राफ अब ऊपर जाने के बजाय तेजी से नीचे की तरफ जा रहा है।
\r\n\r\n| \r\n वित्तीय वर्ष (Financial Year) \r\n | \r\n \r\n देश में कुल एटीएम की संख्या (Total ATMs) \r\n | \r\n \r\n स्थिति (Status) \r\n | \r\n
|---|---|---|
| \r\n वर्ष 2023-24 \r\n | \r\n \r\n 2,53,000 से अधिक \r\n | \r\n \r\n स्थिर (Stable) \r\n | \r\n
| \r\n वर्ष 2024-25 \r\n | \r\n \r\n लगभग 2,51,000 \r\n | \r\n \r\n गिरावट दर्ज (Declined) \r\n | \r\n
रिपोर्ट के मुताबिक, जो मशीनें बंद की जा रही हैं, उनमें से ज्यादातर एटीएम दूरदराज के गांवों और कस्बों के ही हैं, क्योंकि वहां इनका संचालन सबसे ज्यादा खर्चीला साबित हो रहा है।
\r\n\r\nग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है गहरा असर
\r\n\r\nअगर टियर-2 और टियर-3 शहरों में इसी तरह एटीएम बंद होते रहे, तो इसका सीधा और नकारात्मक असर देश के वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) अभियान पर पड़ेगा। गांवों और छोटे कस्बों में आज भी किसान, छोटे व्यापारी और दिहाड़ी मजदूर अपनी दैनिक जरूरतों, खाद-बीज की खरीददारी और आपातकालीन स्थितियों के लिए नकद पैसों पर ही निर्भर हैं। एटीएम बंद होने से उन्हें कई-कई किलोमीटर दूर शहरों की तरफ भागना पड़ेगा।
\r\n\r\nकन्फेडरेशन ऑफ एटीएम इंडस्ट्री (CATMi) ने रिजर्व बैंक (RBI) को जो चेतावनी दी है, वह महज एक व्यापारिक चिंता नहीं है, बल्कि देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा अलर्ट है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्रीय बैंक (RBI) और सरकार इस संकट को टालने के लिए एसबीआई और एटीएम ऑपरेटर्स के बीच कैसे समन्वय स्थापित करते हैं और क्या कड़े कदम उठाते हैं।
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Sabse pehle comment karne wale banein.