धामपुर/बिजनौर: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों (UGC Regulations 2026) को लेकर मचा घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन नियमों पर रोक लगाए जाने के बावजूद, सामान्य वर्ग (General Category) में इसको लेकर गहरा आक्रोश है। इसी क्रम में जनपद बिजनौर के धामपुर में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने अपना विरोध जताने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने ही खून से पत्र लिखा है।READ ALSO:-बिजनौर के लिए गौरव का क्षण: निर्वाचन में 'उत्कृष्ट' कार्य पर DM जसजीत कौर को राष्ट्रपति से मिला सम्मान; दो शिक्षकों ने लखनऊ में गाड़े झंडे, अब इटली जाएगी टीम
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प्रोफेसर का कहना है कि भले ही सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकार को सवर्ण समाज की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।
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कौन हैं डॉ. अमित चौहान?

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विरोध का यह अनोखा तरीका अपनाने वाले डॉ. अमित चौहान मूल रूप से नजीबाबाद क्षेत्र के ग्राम जसवंतपुर उर्फ लुकादड़ी के रहने वाले हैं। वर्तमान में वह धामपुर की स्टेट बैंक कॉलोनी में निवास करते हैं। डॉ. चौहान देवता महाविद्यालय मोरना (Devta Mahavidyalaya Morna) में समाजशास्त्र विभाग (Sociology Department) में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हैं।
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पैथोलॉजी लैब जाकर निकलवाया खून

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डॉ. अमित चौहान ने अपने विरोध को दर्ज कराने के लिए एक दर्दनाक तरीका चुना। जानकारी के मुताबिक, वह पहले एक पैथोलॉजी लैब गए और वहां सिरिंज के जरिए अपना खून निकलवाया। इसके बाद उस खून को एक शीशी (Vial) में लेकर घर आए। बाजार से एक नया इंक पेन खरीदा और उसमें स्याही की जगह अपना खून भरकर एक पोस्टकार्ड पर मुख्यमंत्री के नाम संदेश लिखा।
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पत्र में क्या लिखा?

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अपने खून से लिखे पत्र में डॉ. चौहान ने यूजीसी के नए नियमों को "सवर्णों को मारने का मीठा जहर" करार दिया है। उन्होंने लिखा कि यह 'यूजीसी बिल' सामान्य वर्ग के अस्तित्व को खत्म करने वाला कानून है।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने अपना काम कर दिया है और इन भेदभावपूर्ण नियमों पर रोक लगा दी है। अब केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी है कि वे सवर्ण समाज की रक्षा के लिए अपना कर्तव्य पूरा करें"। वह यह पोस्टकार्ड शनिवार को मुख्यमंत्री कार्यालय को पोस्ट करेंगे।
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क्या है पूरा विवाद? (UGC Regulations 2026 Controversy)

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यह पूरा विवाद 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026' से जुड़ा है।
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    नियमों पर आपत्ति: आरोप है कि इन नए नियमों में 'जातिगत भेदभाव' की परिभाषा को इस तरह गढ़ा गया था कि अगर कोई आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) का छात्र सामान्य वर्ग के छात्र के खिलाफ शिकायत करता है, तो उसे तुरंत भेदभाव माना जाएगा, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्र को यह सुरक्षा नहीं दी गई थी। आलोचकों का कहना है कि यह नियम एकतरफा और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन था।
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    सुप्रीम कोर्ट की रोक: 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इन नियमों को "अस्पष्ट" और "दुरुपयोग के योग्य" (Vague and Capable of Misuse) बताते हुए इन पर तत्काल प्रभाव से रोक (Interim Stay) लगा दी थी।
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कोर्ट ने कहा था कि भेदभाव की परिभाषा ऐसी नहीं हो सकती जो समाज को बांटने का काम करें। कोर्ट ने फिलहाल पुराने 2012 के नियमों को ही लागू रखने का आदेश दिया है।
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स्थानीय लोगों में चर्चा का विषय

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धामपुर और नजीबाबाद क्षेत्र में डॉ. अमित चौहान का यह कदम चर्चा का विषय बना हुआ है। देवता महाविद्यालय के अन्य स्टाफ और स्थानीय बुद्धिजीवियों के बीच इस बात की बहस छिड़ गई है कि क्या सरकारी नीतियों के खिलाफ इतना उग्र प्रदर्शन जायज है, या फिर यह एक वर्ग विशेष की हताशा का परिणाम है।
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डॉ. अमित चौहान द्वारा खून से लिखा गया यह पत्र केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि समाज के एक बड़े तबके की उस चिंता का प्रतीक है जो उन्हें लगता है कि सरकारी नीतियों में उनकी अनदेखी हो रही है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए हस्तक्षेप कर दिया है, लेकिन डॉ. चौहान जैसे लोगों का मानना है कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और सरकार को नीतिगत स्तर पर सुधार करने की जरूरत है।
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