धामपुर/बिजनौर (Education & Local News): उत्तर प्रदेश में इन दिनों माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) की परीक्षाएं पूरे जोरों पर हैं। प्रशासन का पूरा ध्यान नकलविहीन और शांतिपूर्ण परीक्षाएं संपन्न कराने पर है। जिले के सभी परीक्षा केंद्रों पर परीक्षाएं सुचारू रूप से चल भी रही हैं, लेकिन इन परीक्षाओं की रीढ़ माने जाने वाले 'शिक्षणेत्तर कर्मचारियों' (Non-teaching Staff) के मन में सरकार की नीतियों को लेकर भारी आक्रोश पनप रहा है।READ ALSO:-1 अप्रैल से देशभर के पेट्रोल पंपों पर मिलेगा सिर्फ 'E20 पेट्रोल': प्रदूषण और आयात घटेगा, लेकिन आपकी पुरानी गाड़ी के माइलेज पर पड़ेगा सीधा असर!
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जिला बिजनौर में उत्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त माध्यमिक शिक्षा विद्यालयों में कार्यरत क्लर्क, चपरासी और अन्य गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों का यह गुस्सा अब खुलकर सामने आ गया है। हालांकि, इन कर्मचारियों ने अपनी जिम्मेदारी और छात्रों के भविष्य को सर्वोपरि रखते हुए हड़ताल का रास्ता नहीं चुना है, बल्कि गांधीवादी तरीके से अपनी बांह पर काली पट्टी (Black Armband) बांधकर सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने का संकल्प लिया है।
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क्या है पूरा विवाद? (The Core Issue: Discrimination in Healthcare)

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इस पूरे विरोध प्रदर्शन की जड़ में उत्तर प्रदेश शासन की एक नीति है, जिसे शिक्षणेत्तर कर्मचारी अपने साथ 'सौतेला व्यवहार' और सरासर भेदभाव मान रहे हैं।
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    शिक्षकों के लिए कैशलेस सुविधा: हाल ही में शासन स्तर पर राज्य के शिक्षकों (Teachers) के लिए 'कैशलेस चिकित्सा सुविधा' (Cashless Medical Facility) लागू की गई है। इसके तहत बीमार होने पर शिक्षक बिना नकद भुगतान किए बड़े और चिन्हित अस्पतालों में अपना मुफ्त इलाज करा सकते हैं।
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    शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की अनदेखी: विवाद तब शुरू हुआ जब स्कूलों में शिक्षकों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले शिक्षणेत्तर कर्मचारियों (जिनमें बाबू, परिचारक आदि शामिल हैं) को इस महत्वपूर्ण स्वास्थ्य योजना से पूरी तरह बाहर रखा गया।
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    कर्मचारियों का सीधा सवाल: कर्मचारियों का शासन से सीधा और वाजिब सवाल है— "जब हम उसी स्कूल में, उसी विभाग के तहत काम करते हैं, तो बीमारी हमारे लिए भी उतनी ही कष्टदायक है। फिर इलाज के मामले में यह भेदभाव क्यों? क्या हमारी जान की कोई कीमत नहीं है?"
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'छात्रों का नहीं होने देंगे नुकसान': विरोध का अनूठा और अनुकरणीय तरीका

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आमतौर पर जब कोई कर्मचारी संगठन अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करता है, तो सबसे पहले काम का बहिष्कार (हड़ताल) किया जाता है, जिसका सीधा असर आम जनता या छात्रों पर पड़ता है। लेकिन बिजनौर के शिक्षणेत्तर कर्मचारियों ने एक बेहद जिम्मेदार और अनुकरणीय मिसाल पेश की है।
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    काली पट्टी बनी विरोध का प्रतीक: संगठन ने यह तय किया है कि जब तक शासन द्वारा उनके हित में कैशलेस चिकित्सा सुविधा का आधिकारिक आदेश (GO - Government Order) जारी नहीं हो जाता, तब तक जिले के सभी कर्मचारी अपने हाथों पर काली पट्टी बांधकर ड्यूटी करेंगे।
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    परीक्षाओं में कोई बाधा नहीं: कर्मचारियों ने स्पष्ट किया है कि वे अपना सारा कार्य पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ करते रहेंगे। बोर्ड परीक्षाओं की कॉपियां बांटने से लेकर ड्यूटी लगाने और प्रशासनिक कामकाज संभालने तक, कोई भी काम नहीं रोका जाएगा, ताकि परीक्षा दे रहे किसी भी छात्र-छात्रा को किसी भी प्रकार की असुविधा या बाधा का सामना न करना पड़े।
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कर्मचारी नेताओं ने भरी हुंकार: "अंतिम सांस तक लड़ेंगे हक की लड़ाई"

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इस शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ आंदोलन का नेतृत्व शिक्षणेत्तर कर्मचारी संघ, जिला बिजनौर के पदाधिकारी कर रहे हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि उनका यह विरोध तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार उनकी जायज मांगों को मान नहीं लेती।
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मुकेश सिन्हा (जिला अध्यक्ष) का बयान:

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"प्रदेश स्तर के आह्वान पर हमने यह आंदोलन शुरू किया है। सरकार की नीतियां हमारे प्रति दोहरी हैं। हम स्कूलों की व्यवस्था संभालते हैं, लेकिन स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधा से हमें वंचित रखा गया है। जिले के सभी परीक्षा केंद्रों पर हमारे साथी हाथ पर काली पट्टी बांधकर अपना विरोध जता रहे हैं। जब तक हमें हमारा हक नहीं मिल जाता, यह मौन लेकिन सख्त विरोध अनवरत जारी रहेगा।"
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योगेश कुमार (जिला मंत्री) का समर्थन: जिला मंत्री योगेश कुमार ने अध्यक्ष की बात का समर्थन करते हुए कहा कि शिक्षणेत्तर कर्मचारी हमेशा से शिक्षा विभाग की मजबूत नींव रहे हैं। उन्होंने शासन से अपील की है कि वे जल्द से जल्द इस भेदभाव को खत्म करें और कर्मचारियों के परिवारों के स्वास्थ्य को सुरक्षित करने के लिए कैशलेस इलाज का दायरा बढ़ाएं।
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पूरे जिले में फैल रही है विरोध की आग (Impact Across Bijnor)

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यह विरोध प्रदर्शन केवल किसी एक स्कूल या ब्लॉक तक सीमित नहीं है। जिला अध्यक्ष मुकेश सिन्हा ने बताया कि इस आंदोलन में पूरे बिजनौर जिले के सहायता प्राप्त इंटर कॉलेजों के कर्मचारी एकजुट हो चुके हैं। विशेष रूप से इन प्रमुख क्षेत्रों में काली पट्टी बांधकर ड्यूटी की जा रही है:
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    धामपुर (Dhampur)
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    नजीबाबाद (Najibabad)
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    बिजनौर मुख्यालय (Bijnor City)
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    हल्दौर (Haldaur) इन सभी स्थानों पर स्थित सहायता प्राप्त (Aided) इंटर कॉलेजों के कार्यालयों और परीक्षा कक्षों में कर्मचारी काली पट्टी के साथ व्यवस्थाएं संभालते हुए देखे जा सकते हैं।
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शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की यह मांग मानवीय दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील और जायज नजर आती है। बीमारी और स्वास्थ्य आपातकाल किसी भी व्यक्ति (चाहे वह शिक्षक हो या चपरासी) के बीच पद का भेदभाव नहीं करते। ऐसे में, कर्मचारियों द्वारा बिना परीक्षा बाधित किए अपनाए गए इस शांतिपूर्ण विरोध की हर तरफ सराहना भी हो रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश का शिक्षा विभाग और शासन इन कर्मचारियों की इस खामोश लेकिन मजबूत आवाज को कब सुनता है।
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