बिजनौर के शेरकोट थाना क्षेत्र के नया गांव रोड पर एक 5 वर्षीय नर गुलदार की हाईटेंशन विद्युत लाइन की चपेट में आने से मौत हो गई। बताया जा रहा है कि गुलदार बंदर का शिकार करने के लिए पेड़ पर चढ़ा
Published at : 28 Feb 2026, 08:19 AM
Updated at : 11 Sep 2026, 06:37 PM
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Leopard Dies Of Electrocution While Chasing Monkey In Bijnor UP
उत्तर प्रदेश का बिजनौर जिला, जो अपनी हरियाली, गन्ने के विशाल खेतों और समृद्ध वन्यजीवों के लिए जाना जाता है, अक्सर इंसानों और जंगली जानवरों के बीच टकराव (Man-Animal Conflict) की खबरों का केंद्र बना रहता है। लेकिन शुक्रवार/शनिवार की दरमियानी रात एक ऐसी घटना घटी, जिसने वन्यजीव प्रेमियों और स्थानीय प्रशासन दोनों को झकझोर कर रख दिया है। एक शक्तिशाली और फुर्तीले गुलदार (तेंदुए) की जान किसी शिकारी की गोली या आपसी संघर्ष में नहीं, बल्कि विकास की अंधी दौड़ का प्रतीक बन चुकी 'हाईटेंशन विद्युत लाइन' की चपेट में आने से चली गई।READ ALSO:-गाजियाबाद में अभिव्यक्ति पर खूनी प्रहार: कट्टरता के खिलाफ आवाज उठाने वाले यूट्यूबर सलीम वास्तिक को नकाबपोशों ने 14 बार घोंपा चाकू, गला रेतने की खौफनाक साजिश
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यह पूरी घटना न केवल एक शानदार वन्यजीव की दुखद मौत की कहानी है, बल्कि यह हमारे बेतरतीब बुनियादी ढांचे (Infrastructure) और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास के बीच बढ़ते खतरनाक अतिक्रमण की ओर भी सीधा इशारा करती है। आइए, इस पूरी घटना के घटनाक्रम, वन विभाग की कार्रवाई और बिजनौर में गहराते वन्यजीव संकट का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।
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वारदात की जगह और खौफ का वो मंजर
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यह दर्दनाक और चौंकाने वाला हादसा बिजनौर जिले के शेरकोट थाना क्षेत्र में सामने आया है। शेरकोट इलाका हमेशा से वन्यजीवों की आवाजाही के लिए संवेदनशील रहा है। जानकारी के मुताबिक, यह घटना शेरकोट क्षेत्र के मंधोरा मार्ग पर स्थित 'नया गांव' रोड की है। इसी सड़क के किनारे एक पटाखा फैक्ट्री भी स्थित है।
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@Shakeel57767846 बिजनौर के शेरकोट थाना क्षेत्र के नया गांव रोड पर एक 5 वर्षीय नर गुलदार की हाईटेंशन विद्युत लाइन की चपेट में आने से मौत हो गई। बताया जा रहा है कि गुलदार बंदर का शिकार करने के लिए पेड़ पर चढ़ा था। वन विभाग ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। pic.twitter.com/IGFtwwilsB
अमूमन रात के अंधेरे में जंगली जानवर इंसानी बस्तियों या सड़कों के किनारे अपने शिकार की तलाश में निकलते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, गुलदार (Leopard) स्वभाव से बहुत शर्मीला लेकिन बेहद फुर्तीला शिकारी होता है। वह अक्सर पेड़ों पर घात लगाकर बैठना और शिकार करना पसंद करता है। इसी इलाके में मंधोरा मार्ग के पास पेड़ और झाड़ियां हैं, जो शिकारियों के लिए एक आदर्श छिपने की जगह बनती हैं।
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आखिर उस रात क्या हुआ था? शिकार और मौत का खेल
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स्थानीय लोगों और वन विभाग द्वारा किए गए प्रारंभिक मुआयने के आधार पर जो कहानी सामने आई है, वह किसी वाइल्डलाइफ डॉक्यूमेंट्री के रोमांचक लेकिन दुखद दृश्य जैसी है।
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बताया जा रहा है कि रात के अंधेरे में एक बंदर इस इलाके के एक पेड़ पर बैठा था। तभी इस 5 वर्षीय नर गुलदार की नजर उस बंदर पर पड़ गई। गुलदार अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के अनुसार शिकार को दबोचने के लिए तेजी से उस पेड़ पर चढ़ गया। बंदर अपनी जान बचाने के लिए पेड़ की ऊंची टहनियों की ओर भागा होगा और उसके पीछे-पीछे गुलदार भी ऊंचाई पर पहुंच गया।
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लेकिन, शिकार के इस रोमांचक खेल में गुलदार को उस अदृश्य और जानलेवा खतरे का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था जो पेड़ की टहनियों के ठीक ऊपर से गुजर रहा था। पेड़ के ऊपर से 11,000 या 33,000 वोल्ट की मौत की तारें, यानी हाईटेंशन विद्युत लाइन (High Tension Power Line) गुजर रही थी।
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शिकार को पकड़ने की जद्दोजहद में या पेड़ की किसी टहनी के तारों से छू जाने के कारण, गुलदार का शरीर सीधे उस नंगी और खतरनाक हाईटेंशन लाइन की चपेट में आ गया। करंट का झटका इतना भयानक और जोरदार था कि इस विशालकाय और ताकतवर जानवर की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। बिजली के झटके से झुलसने के बाद गुलदार का भारी-भरकम शरीर धड़ाम से नीचे सड़क किनारे आ गिरा।
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सुबह का वक्त: मॉर्निंग वॉक और सड़क पर पसरी दहशत
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रात के अंधेरे में हुआ यह हादसा तब तक किसी की नजर में नहीं आया, जब तक कि सुबह की रोशनी नहीं फूट गई।
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रोजाना की तरह सुबह के समय शेरकोट और नया गांव इलाके के कुछ युवक सड़क पर मॉर्निंग वॉक (सुबह की सैर) के लिए निकले थे। जब वे मंधोरा मार्ग पर नया गांव रोड पर पटाखा फैक्ट्री के पास पहुंचे, तो उनकी नजर सड़क किनारे पड़ी एक विशाल और चितकबरी चीज पर पड़ी।
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जब वे थोड़ा करीब गए तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। सड़क के ठीक किनारे एक विशालकाय गुलदार का शव पड़ा हुआ था। यह नजारा देखते ही युवकों के होश उड़ गए और वे घबराकर वहां से पीछे हटे।
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इलाके में मची अफरा-तफरी
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"सड़क किनारे गुलदार पड़ा है!" — यह खबर जंगल में आग की तरह पूरे शेरकोट और आसपास के नया गांव इलाके में फैल गई। देखते ही देखते मौके पर भारी भीड़ जमा हो गई। ग्रामीण लाठी-डंडे लेकर एहतियातन मौके पर पहुंचने लगे, क्योंकि शुरुआत में लोगों को लगा कि शायद गुलदार जिंदा है या बेहोश है। जब यह स्पष्ट हो गया कि जानवर की मौत हो चुकी है, तब जाकर लोगों ने राहत की सांस ली। हालांकि, इस घटना से पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया था।
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लोगों ने तुरंत शेरकोट थाना पुलिस और स्थानीय वन विभाग (Forest Department) के अधिकारियों को फोन पर इस सनसनीखेज घटना की सूचना दी।
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वन विभाग का एक्शन: रेस्क्यू टीम का पहुंचना और प्रारंभिक जांच
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गुलदार के शव मिलने की सूचना मिलते ही बिजनौर वन विभाग (Bijnor Forest Department) में हड़कंप मच गया। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (Wildlife Protection Act, 1972) के तहत गुलदार (Leopard - Panthera pardus) अनुसूची-1 (Schedule-1) का अति संरक्षित प्राणी है। इसकी मौत का मामला बेहद गंभीर होता है।
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सूचना पाकर वन विभाग की एक विशेष रेस्क्यू और जांच टीम तुरंत मौके पर पहुंच गई। वन विभाग के अधिकारियों ने सबसे पहले भीड़ को पीछे हटाया और घटनास्थल को सुरक्षित घेरे में (Cordon off) लिया।
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शव का मुआयना और उम्र का अंदाजा
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वन विभाग के पशु चिकित्सकों और विशेषज्ञों की टीम ने मृत गुलदार के शव का प्रारंभिक मुआयना किया।
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लिंग: जांच में यह पुष्टि हुई कि करंट लगने से मारा गया यह वन्यजीव एक 'नर गुलदार' (Male Leopard) था।
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उम्र और शारीरिक बनावट: विशेषज्ञों ने इसके दांतों, पंजों और शारीरिक कद-काठी को देखकर अनुमान लगाया कि इस नर गुलदार की उम्र करीब 5 साल रही होगी। 5 साल की उम्र किसी भी गुलदार के लिए उसकी युवावस्था और सबसे अधिक ताकत का समय होता है।
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अधिकारियों ने मौके का बारीकी से निरीक्षण किया। पेड़ की टूटी हुई टहनियां, तारों की स्थिति और गुलदार के शरीर पर मौजूद झुलसने (Burn marks) के निशानों से इस बात की शत-प्रतिशत पुष्टि हो गई कि उसकी मौत हाईटेंशन विद्युत लाइन की चपेट में आने (Electrocution) से ही हुई है।
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पोस्टमार्टम और आगे की वैधानिक कार्रवाई
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वन्यजीव कानूनों के सख्त प्रोटोकॉल के तहत, वन विभाग की टीम ने एक विशेष वाहन में गुलदार के भारी-भरकम शव को सुरक्षित रखवाया। इसके बाद शव को पशु चिकित्सालय में पैनल द्वारा पोस्टमार्टम (Post-mortem) के लिए भेज दिया गया है।
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पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से यह आधिकारिक रूप से स्पष्ट हो जाएगा कि मौत का सटीक कारण कार्डियक अरेस्ट (विद्युत प्रहार के कारण) था या शरीर के भीतरी अंगों के जलने से। वन विभाग की आगे की कागजी और वैधानिक कार्रवाई फिलहाल जारी है। पोस्टमार्टम के बाद पूरे राजकीय और विभागीय सम्मान व प्रोटोकॉल के साथ शव का अंतिम संस्कार (जलाकर) किया जाएगा ताकि उसके अंगों (नाखून, दांत, खाल) की तस्करी न हो सके।
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बिजनौर में गुलदार: गन्ने के खेत बने 'नया जंगल'
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बिजनौर के शेरकोट में हुई यह घटना कोई अपवाद नहीं है। बिजनौर जिला उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में आता है और इसकी सीमाएं उत्तराखंड के कॉर्बेट नेशनल पार्क (Corbett National Park) और यूपी के अमानगढ़ टाइगर रिजर्व (Amangarh Tiger Reserve) से सटी हुई हैं।
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इंसानी बस्तियों में क्यों आ रहे हैं गुलदार?
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पिछले एक दशक में बिजनौर में गुलदारों की आबादी में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इसके पीछे कई मुख्य कारण हैं:
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गन्ने के विशाल खेत (Sugarcane Fields): बिजनौर की मुख्य फसल गन्ना है। गन्ने के खेत 10 से 12 फीट ऊंचे होते हैं, जो 8 से 10 महीनों तक एक 'अस्थायी और सुरक्षित जंगल' का काम करते हैं। मादा गुलदार अक्सर इन खेतों को अपने शावकों (Cubs) को जन्म देने और छिपाने के लिए सबसे सुरक्षित मानती हैं।
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आसान शिकार: जंगलों में हिरण या जंगली सूअर का शिकार करने में ज्यादा मेहनत लगती है। इसके विपरीत, इंसानी बस्तियों के किनारे, खेतों में और गांवों की सड़कों पर आवारा कुत्ते, बंदर, बकरियां और बछड़े आसानी से मिल जाते हैं। गुलदार इस 'इजी प्रे' (Easy Prey) की लालच में आबादी की तरफ खिंचे चले आते हैं।
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इस घटना में भी यही हुआ। गुलदार बंदर के रूप में अपने आसान शिकार के पीछे भागा था, जो अंततः उसकी मौत का कारण बन गया।
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विद्युत लाइनें (Power Lines): वन्यजीवों के लिए एक अदृश्य और 'साइलेंट किलर'
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शेरकोट के नया गांव मार्ग पर हुई इस घटना ने एक बार फिर भारत में वन्यजीव संरक्षण की एक सबसे बड़ी और अनदेखी चुनौती को सामने ला दिया है—अनियोजित बिजली का ढांचा।
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भारत भर में (विशेषकर तराई और वन क्षेत्रों के आसपास) हाईटेंशन लाइनें वन्यजीवों के लिए 'साइलेंट किलर' (खामोश कातिल) साबित हो रही हैं।
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खतरे का गणित
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झूलते तार: अक्सर ग्रामीण इलाकों में बिजली के तार मानकों के अनुरूप ऊंचाई पर नहीं होते। समय के साथ तार ढीले होकर झूलने लगते हैं। पेड़ों की शाखाएं अक्सर इन तारों को छूने लगती हैं।
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पेड़ों की छंटाई का अभाव: बिजली विभाग (Power Corporation) और वन विभाग के बीच समन्वय की कमी के कारण तारों के नीचे या आसपास के पेड़ों की नियमित छंटाई (Pruning) नहीं होती।
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जब कोई जंगली जानवर (जैसे गुलदार, बंदर या हाथी) शिकार करने या भोजन की तलाश में ऐसे पेड़ों पर चढ़ता है, तो वे सीधे इन तारों की चपेट में आ जाते हैं।
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आंकड़े क्या कहते हैं?
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पूरे भारत में हाथियों, तेंदुओं (गुलदार) और दुर्लभ पक्षियों की मौतों का एक बहुत बड़ा प्रतिशत बिजली के झटके (Electrocution) के कारण होता है। कई मामलों में शिकारी जानबूझकर तारों में करंट छोड़कर जानवरों का शिकार करते हैं, लेकिन बिजनौर के इस मामले में यह विशुद्ध रूप से एक दुखद हादसा (Accident) प्रतीत होता है, जहां जानवर खुद शिकार की तलाश में मौत के तारों तक पहुंच गया।
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समाधान की ओर: क्या किया जाना चाहिए?
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इस 5 वर्षीय शानदार नर गुलदार की मौत एक वेक-अप कॉल (चेतावनी) है। प्रशासन, बिजली विभाग और वन विभाग को मिलकर कुछ ठोस कदम उठाने होंगे:
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तारों का इंसुलेशन (Insulated Cables): वन क्षेत्रों और वन्यजीव बहुल ग्रामीण इलाकों (जैसे शेरकोट) में नंगी तारों (Bare Conductors) को बदलकर कवर्ड या इंसुलेटेड (Insulated / AB Cable) केबल लगाई जानी चाहिए।
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अंडरग्राउंड केबलिंग (Underground Cabling): अत्यधिक संवेदनशील वन्यजीव गलियारों (Wildlife Corridors) में बिजली की लाइनों को भूमिगत (Underground) किया जाना चाहिए।
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नियमित गश्त और छंटाई: बिजली विभाग को मानसून से पहले और बाद में विद्युत लाइनों के आसपास के पेड़ों की शाखाओं को नियमित रूप से काटना चाहिए ताकि पेड़ तारों के संपर्क में न आएं।
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जागरूकता अभियान: ग्रामीणों और किसानों को जागरूक किया जाना चाहिए कि यदि उन्हें खेतों या सड़कों के पास हाईटेंशन तार लटकते हुए दिखें, तो तुरंत प्रशासन को सूचित करें।
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एक अपूरणीय क्षति
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बिजनौर के थाना शेरकोट के मंधोरा मार्ग पर नया गांव के पास हुई यह घटना सिर्फ एक जानवर की मौत नहीं है, बल्कि यह हमारे इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) का एक बड़ा नुकसान है। गुलदार खाद्य श्रृंखला (Food Chain) के शीर्ष शिकारियों में से एक हैं, जो प्रकृति का संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
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जिस नर गुलदार की उम्र अभी सिर्फ 5 साल थी और जिसे जंगल में कई और साल राज करना था, उसका सफर एक झूलते हुए हाईटेंशन तार ने पल भर में खत्म कर दिया।
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वन विभाग अपनी पोस्टमार्टम और कानूनी कार्रवाई तो पूरी कर लेगा, लेकिन असली न्याय और संरक्षण तब होगा जब हम यह सुनिश्चित करेंगे कि विकास की ये 'तारें' किसी बेजुबान और शानदार वन्यजीव की जिंदगी के लिए फंदा न बनें। प्रशासन को इस घटना से सबक लेकर इलाके के इंफ्रास्ट्रक्चर को वन्यजीवों के अनुकूल (Wildlife-friendly) बनाने की दिशा में तत्काल काम करना चाहिए।
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