इस्लामी कैलेंडर के रबी-उल-अव्वल महीने का हर एक दिन अकीदतमंदों के लिए बेहद ख़ास होता है, क्योंकि यह वही मुकद्दस महीना है जिसमें पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ इस दुनिया में तशरीफ़ लाए। उनके आने से दुनिया में अज्ञानता का अंधेरा दूर हुआ और इंसानियत, मुहब्बत और भाईचारे का पैग़ाम आम हुआ। पूरी दुनिया के साथ-साथ हिंदुस्तान के कोने-कोने में भी जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी ﷺ को पूरी अकीदत और एहतराम के साथ मनाया जा रहा है। इसी कड़ी में बिजनौर ज़िले के धामपुर शहर में भी एक बेहद भव्य और रूहानी आयोजन किया गया, जिसने पूरे इलाके के माहौल को नूरानी बना दिया।READ ALSO:- बिजनौर के धामपुर में मौत का तांडव: स्कूटी सवार को बचाने में टकराए ट्रक और कंटेनर, धू-धू कर जला ट्रक, केबिन में फंसा चालक जिंदा जला
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हज़रत सय्यद नमक शाह बाबा के आस्ताने पर उमड़े अकीदतमंद

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धामपुर शहर के हृदय स्थल 'बड़ी मंडी' इलाके में स्थित हज़रत सय्यद नमक शाह बाबा का आस्ताना-ए-मुबारक हमेशा से ही अकीदत और रूहानियत का मरकज़ रहा है। जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी ﷺ के मुबारक मौके पर इस दरगाह को बेहद खूबसूरती के साथ सजाया गया था। रंग-बिरंगी रोशनियों, फूलों की खुशबू और इत्र की महक ने दरगाह के प्रांगण को एक जन्नत का नज़ारा दे दिया था। इस मुकद्दस मौके पर एक रूहानी और पुरनूर 'महफ़िल-ए-मिलाद' का आयोजन किया गया। शाम ढलते ही अकीदतमंदों का दरगाह पर पहुंचना शुरू हो गया था। देखते ही देखते पूरा आस्ताना ज़ायरीनों और आशिक़ान-ए-रसूल से खचाखच भर गया। हर कोई बारगाह-ए-रिसालत ﷺ में अपनी अकीदत के फूल पेश करने के लिए बेताब नज़र आ रहा था।
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तिलावत-ए-कुरआन और नात-ए-पाक से हुआ महफ़िल का रूहानी आगाज़

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इस्लामी रिवायतों के मुताबिक, किसी भी मुकद्दस महफ़िल की शुरुआत अल्लाह के कलाम से की जाती है। इस महफ़िल का ब-कायदा आगाज़ भी दरगाह के सज्जादा नशीन मोहम्मद आबिद सकलैनी ने किया। उन्होंने अपने बेहद सुरीले और रूहानी अंदाज़ में कुरआन-ए-मजीद की मुकद्दस आयतों की तिलावत की। तिलावत की आवाज़ सुनते ही महफ़िल में एक गहरा सुकून और सन्नाटा छा गया।
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इसके तुरंत बाद मशहूर नात-ख्वां हबीब हसन सकलैनी ने माइक संभाला और नात-ए-सरवर-ए-कौनैन ﷺ (पैग़म्बर मुहम्मद के सम्मान में गाई जाने वाली कविता) पेश की। उनके पढ़ने का अंदाज़ इतना दिलकश था कि वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं और पूरा माहौल नूरानी हो उठा। "सुभान अल्लाह" और "माशाअल्लाह" की सदाओं से दरगाह का कोना-कोना गूंज उठा।
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मिलाद शरीफ ने दिलों को किया मुहब्बत-ए-रसूल ﷺ से सराबोर

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महफ़िल जैसे-जैसे आगे बढ़ी, रूहानियत का रंग और गहरा होता गया। हबीब हसन सकलैनी की नात के उपरांत मोहम्मद नासिर अकरमी और उनके हमनवा (साथियों) ने मंच पर आकर हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ का मिलाद शरीफ पढ़ा। मिलाद-ए-पाक में पैग़म्बर ﷺ की पैदाइश, उनके जीवन की घटनाओं और उनके द्वारा दिए गए इंसानियत के संदेशों को बेहद खूबसूरती से बयां किया गया।
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मोहम्मद नासिर अकरमी की पुरकैफ आवाज़ ने महफ़िल में मौजूद लोगों के दिलों को मुहब्बत-ए-रसूल ﷺ से पूरी तरह सराबोर कर दिया। फिज़ा में एक अलग ही तासीर घुल गई थी। हर तरफ़ से दरूद-ओ-सलाम की सदाएं بلند (बुलंद) होने लगीं। अकीदतमंदों ने खड़े होकर आका की बारगाह में सलातो-सलाम का नज़राना पेश किया।
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मशहूर शायरों ने पेश किए खूबसूरत कलाम, गूंजे नारे-ए-तकबीर

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महफ़िल-ए-मिलाद को और भी ज़्यादा परवान चढ़ाने का काम वहां मौजूद नामवर शायरों ने किया। इस ख़ास मौके पर मशहूर शायर एजाज़ धामपुरी, पेंटर साहब, हबीब हसन सकलैनी सहित इलाके के कई अन्य मशहूर शायरों ने शिरकत की।
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इन शायरों ने बारगाह-ए-कौनैन ﷺ में अपने अकीदत से भरे खूबसूरत कलाम और नातिया अशआर (शेर) पेश किए। हर एक शेर पर पैग़म्बर की मुहब्बत छलक रही थी। जब शायरों ने अपने कलाम के ज़रिए नबी की शान में कसीदे पढ़े, तो हाज़िरीन (श्रोताओं) ने दिल खोलकर दाद दी। पूरा माहौल नारे-ए-तकबीर (अल्लाह हू अकबर) और नारे-ए-रिसालत (या रसूल अल्लाह) की सदाओं से गूंज उठा। युवाओं और बुज़ुर्गों, सभी ने इस नातिया मुशायरे का भरपूर लुत्फ़ उठाया।
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औलिया-ए-किराम की ज़िंदगी से मिला इंसानियत का पैग़ाम

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महफ़िल के इस रूहानी सफर में तक़रीर (भाषण) का दौर भी चला। दरगाह के सज्जादा नशीन मोहम्मद आबिद सकलैनी ने अवाम को संबोधित करते हुए औलिया-ए-किराम (सूफी संतों) के ईमानी और रूहानी वाक़ियात बयान किए। उन्होंने बताया कि कैसे सूफी संतों ने हमेशा पैग़म्बर-ए-इस्लाम के बताए हुए रास्तों पर चलकर समाज में मुहब्बत, शांति और इंसानियत का बीज बोया।
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उन्होंने हाज़िरीन को संबोधित करते हुए कहा कि आज के इस चुनौतीपूर्ण दौर में हमें बुज़ुर्गों और औलिया-ए-किराम की ज़िंदगी से सबक लेने की ज़रूरत है। उन्होंने लोगों को बुराइयों से दूर रहने, नेकियों के रास्ते पर चलने, गरीबों की मदद करने और समाज में आपसी भाईचारा कायम रखने की नसीहत दी। उनके इस मार्मिक और प्रेरणादायक बयान से महफ़िल में मौजूद हर शख्स ने इंसानियत के रास्ते पर चलने का संकल्प लिया।
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मुल्क की खुशहाली और अमन-चैन के लिए खुसूसी दुआ

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घंटों तक चली इस रूहानी और बेमिसाल महफ़िल का समापन बेहद भावुक और अकीदत भरे माहौल में हुआ। महफ़िल के आखिर में सभी अकीदतमंदों ने खड़े होकर हुज़ूर ﷺ की शान में सलात-ओ-सलाम पेश किया। इसके बाद नमक शाह बाबा के आस्ताने पर फातिहा-ख्वानी की रस्म अदा की गई।
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अंत में मोहम्मद आबिद सकलैनी ने दोनों हाथ उठाकर बारगाह-ए-इलाही में खुसूसी दुआ (विशेष प्रार्थना) की। इस दुआ में न केवल वहां मौजूद लोगों की मगफिरत की गुज़ारिश की गई, बल्कि पूरे मुल्क (हिंदुस्तान) में अमन, शांति, तरक्की, खुशहाली और आपसी भाईचारे के लिए भी दुआ मांगी गई। इसके साथ ही पूरी दुनिया में मज़लूमों के हक़ में और सुकून कायम होने की भी प्रार्थना की गई। दुआ के दौरान हर किसी की ज़बान पर "आमीन" था। तबर्रुक (प्रसाद) तकसीम करने के साथ महफ़िल अपने मुकाम पर पहुंची।
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महफ़िल में इन प्रमुख हस्तियों ने की शिरकत

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इस भव्य आयोजन को सफल बनाने में धामपुर के कई गणमान्य नागरिकों और अकीदतमंदों का विशेष योगदान रहा।
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    हाजी ज़ाकिर सलमानी
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    नईम जज़्बी
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    हाशिम कुरैशी
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    मोहम्मद आरिफ (गुड्डू भाई)
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    ज़ाहिद सलमानी
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    नफ़ीस अहमद
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    सोनू सलमानी
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    अहमद रज़ा
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    उमैर अली
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    राशिद सकलैनी
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    काशिफ लतीफी
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    सलीम समरी
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इन सभी के अलावा शहर व आसपास के इलाकों से सैकड़ों की संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने इस महफ़िल में अपनी हाज़िरी दर्ज कराई। कुल मिलाकर, धामपुर की इस महफ़िल-ए-मिलाद ने मुहब्बत-ए-रसूल ﷺ, भाईचारे और अमन का एक ऐसा मज़बूत पैग़ाम दिया, जिसकी गूंज लंबे समय तक लोगों के दिलों में महकती रहेगी।
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