प्रयागराज/बिजनौर (8 अप्रैल 2026): क्या लंबे समय तक रजामंदी (Consent) से चले आ रहे प्रेम प्रसंग और शारीरिक संबंधों को बाद में 'शादी का झांसा' (False Promise of Marriage) देकर रेप करने की श्रेणी में रखा जा सकता है? भारतीय न्याय व्यवस्था में यह एक बेहद संवेदनशील और बहस का मुद्दा रहा है। इसी अहम कानूनी सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला आदेश पारित किया है।READ ALSO:-मोदी..., कटोरा... नारे पर भड़के ADM, जीतू नागपाल को दी जेल भेजने की चेतावनी, बोले–आप सपा में हो, यहां राजनीति मत करिए
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद थाने में दर्ज एक ऐसे ही मामले में सुनवाई करते हुए आरोपियों की गिरफ्तारी पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। यह मामला नए आपराधिक कानून यानी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) अधिनियम के तहत दर्ज किया गया था।
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न्यायमूर्ति राजीव मिश्र और न्यायमूर्ति पद्म नारायण मिश्र की खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं (आरोपियों) के अधिवक्ता और राज्य सरकार के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद यह सख्त और स्पष्ट आदेश जारी किया है।
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क्या है बिजनौर के नजीबाबाद का पूरा मामला?

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कानूनी दस्तावेजों और पुलिस एफआईआर (FIR) के अनुसार, यह पूरा विवाद बिजनौर जिले के नजीबाबाद थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।
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एक बालिग युवती (शिकायतकर्ता) ने थाने में तहरीर देकर आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसे शादी का झूठा वादा किया और इस वादे की आड़ में लंबे समय तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। जब शादी की बात आई तो आरोपी मुकर गया। पुलिस ने पीड़िता की शिकायत के आधार पर नए कानून बीएनएस (BNS) की धारा 69 (जिसमें शादी के झूठे वादे पर यौन संबंध बनाने को अपराध माना गया है) और SC/ST एक्ट की गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था।
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एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दे रही थी, जिससे बचने और न्याय की गुहार लगाने के लिए आरोपियों (जिसमें विशाल गुप्ता का नाम प्रमुखता से सामने आया है) ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से सीधे इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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अदालत में याचिकाकर्ता के वकील की मजबूत दलीलें

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हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचियों के अधिवक्ता ने जो तथ्य और दलीलें पेश कीं, उन्होंने पूरे केस की दिशा ही बदल दी। याचिकाकर्ता के वकील ने मामले को 'धोखाधड़ी' के बजाय 'सहमतिपूर्ण संबंधों' (Consensual Relationship) का परिणाम साबित करने पर जोर दिया।
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    5 साल का लंबा रिश्ता: वकील ने कोर्ट को बताया कि पीड़िता और मुख्य आरोपी पिछले पांच वर्षों से एक-दूसरे को जानते थे और उनके बीच सहमतिपूर्ण प्रेम संबंध थे। इसके अलावा, पिछले दो वर्षों से अधिक समय से वे अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध में भी थे।
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    बालिग होने का तर्क: अधिवक्ता ने तर्क दिया कि पीड़िता एक पढ़ी-लिखी और वयस्क (Adult) महिला है। उसने अपनी पूर्ण इच्छा, मर्जी और परिणामों को समझते हुए ये संबंध बनाए थे।
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    विशाल गुप्ता ने कर ली है शादी: कोर्ट में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला तर्क यह दिया गया कि मुख्य आरोपी 'विशाल गुप्ता' ने अब पीड़िता से बकायदा विवाह कर लिया है। अब वे दोनों कानूनी रूप से पति-पत्नी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। ऐसे में इस मामले को 'शादी का झांसा' देकर किए गए अपराध की श्रेणी में कतई नहीं रखा जा सकता।
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सुप्रीम कोर्ट के 'नजीर' फैसले (Precedent) का मिला सहारा

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याचिकाकर्ताओं के वकील ने अपनी दलीलों को वजनदार बनाने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) के एक हालिया और बेहद चर्चित फैसले का हवाला दिया।
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वकील ने कोर्ट के सामने 'विश्वज्योति चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' (Bishwajyoti Chatterjee vs State of West Bengal) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई व्यवस्था का उल्लेख किया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि दो वयस्क लोग लंबे समय तक स्वेच्छा से शारीरिक और भावनात्मक संबंधों में रहते हैं, तो रिश्ते के टूट जाने या शादी न हो पाने की स्थिति में उसे हर बार 'शादी का झूठा वादा' नहीं माना जा सकता। 'झूठा वादा' साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी की नीयत संबंध बनाने के पहले दिन से ही धोखा देने की थी।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त आदेश: "बिना अनुमति चार्जशीट नहीं"

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खंडपीठ ने मामले की गंभीरता, दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक चले संबंधों, याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए सुप्रीम कोर्ट के दृष्टांत और सबसे अहम—दोनों के बीच हो चुकी शादी के तथ्य को संज्ञान में लिया।
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इन सभी कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए:

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    गिरफ्तारी पर पूर्ण रोक: कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया है कि इस मामले में नामजद किसी भी आरोपी की तत्काल प्रभाव से गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।
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    जांच जारी रहेगी, लेकिन...: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस अपनी कानूनी प्रक्रिया के तहत मामले की तफ्तीश (Investigation) जारी रख सकती है, लेकिन पुलिस को हाईकोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना संबंधित निचली अदालत में अंतिम रिपोर्ट (Final Report) या आरोपपत्र (Charge-sheet) दाखिल करने का अधिकार नहीं होगा।
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    जवाब तलब: कोर्ट ने इस याचिका पर उत्तर प्रदेश राज्य सरकार और शिकायतकर्ता (पीड़िता) दोनों को नोटिस जारी करते हुए छह सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब (Counter Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया है।
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क्या कहती है नई BNS की धारा 69? (कानूनी विश्लेषण)

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यह मामला इसलिए भी सुर्खियों में है क्योंकि इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 का इस्तेमाल हुआ है। पुराने आईपीसी (IPC) में शादी का झांसा देकर रेप के मामलों को धारा 376 के तहत ही निपटाया जाता था, जिसे लेकर अदालतों में बहुत भ्रम रहता था।
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लेकिन नए कानून (BNS) में धारा 69 को विशेष रूप से इसी अपराध के लिए जोड़ा गया है। इसके तहत:

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"जो कोई भी धोखाधड़ी के इरादे से या शादी का झूठा वादा करके किसी महिला के साथ यौन संबंध बनाता है (जो बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता), उसे 10 साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है।"
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हालांकि, कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह ताजा फैसला पुलिस को इस धारा के 'अंधाधुंध इस्तेमाल' से रोकेगा। यह फैसला स्पष्ट करता है कि सहमति से बने लंबे रिश्तों के टूटने पर हर बार इस धारा का हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
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आगे क्या?
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस बेहद महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई के लिए 29 मई 2026 की तारीख मुकर्रर की है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार और शिकायतकर्ता छह हफ्ते के भीतर कोर्ट में क्या जवाब दाखिल करते हैं। फिलहाल, बिजनौर के इन आरोपियों के लिए हाईकोर्ट का यह आदेश किसी बड़ी 'संजीवनी' से कम नहीं है।
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(देश की अदालतों के हर बड़े फैसले, नए कानूनों के विश्लेषण और यूपी की तमाम बड़ी खबरों के लिए 'खबरीलाल' के साथ बने रहें।)
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