बिजनौर (Bijnor News): उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में वन संपदा की सुरक्षा को लेकर वन विभाग की मुस्तैदी एक बार फिर देखने को मिली है। लकड़ी तस्करों के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत साहूवाला वन रेंज (Sahuwala Forest Range) की टीम को एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। वन विभाग की गश्ती टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर कार्रवाई करते हुए हरेवली गंगा बैराज (Harevali Ganga Barrage) के पास से खैर की कीमती लकड़ी से भरी एक पिकअप गाड़ी को जब्त किया है।Read also:-बिजनौर में 'सफेद आफत': घने कोहरे ने छीन ली हाईवे की रफ्तार; ट्रक, डीसीएम और ट्रैक्टर की भीषण भिड़ंत से दहल उठी सोमवार की सुबह
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इस दौरान वन विभाग की टीम ने घेराबंदी करते हुए पिकअप चालक को हिरासत में ले लिया है, जबकि उसका एक साथी अंधेरे और जंगल का फायदा उठाकर मौके से फरार होने में कामयाब रहा। वन दरोगा साजिद मलिक ने बताया कि पकड़ा गया आरोपी रामपुर जिले का निवासी है और वे जंगल से अवैध रूप से काटी गई खैर की लकड़ी को तस्करी कर ले जा रहे थे।
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साहूवाला रेंज में वन विभाग की सर्जिकल स्ट्राइक

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बिजनौर का नजीबाबाद वन प्रभाग अपनी वन संपदा और वन्यजीवों के लिए जाना जाता है, लेकिन यह क्षेत्र लकड़ी माफियाओं की नजर में भी रहता है। विशेषकर 'खैर' (Khair) के पेड़ों की अवैध कटाई इस क्षेत्र में एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
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घटना की जानकारी देते हुए वन दरोगा साजिद मलिक ने बताया कि वन विभाग को मुखबिर से सूचना मिली थी कि साहूवाला रेंज के जंगलों में कुछ संदिग्ध गतिविधियां देखी गई हैं और एक वाहन अवैध लकड़ी लेकर गंगा बैराज की तरफ बढ़ने वाला है। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम अलर्ट हो गई।
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टीम ने हरेवली गंगा बैराज के पास नाकाबंदी कर दी। देर रात जब एक संदिग्ध पिकअप गाड़ी वहां से गुजरी, तो वन कर्मियों ने उसे रुकने का इशारा किया। खुद को घिरता देख तस्करों ने भागने का प्रयास किया, लेकिन वन विभाग की मुस्तैद टीम ने गाड़ी को चारों तरफ से घेर लिया।
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रामपुर का तस्कर गिरफ्तार, साथी फरार

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कार्रवाई के दौरान वन विभाग ने पिकअप के चालक को मौके पर ही दबोच लिया। पूछताछ में उसने अपनी पहचान जिला रामपुर (Rampur) के निवासी के रूप में बताई है। हालांकि, इस अफरातफरी के बीच उसका एक अन्य साथी, जो संभवतः गाड़ी में ही सवार था या एस्कॉर्ट कर रहा था, मौके से भागने में सफल रहा।
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वन विभाग की टीम ने फरार आरोपी की तलाश शुरू कर दी है। पकड़े गए आरोपी से पूछताछ की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि वे लकड़ी कहां से काटकर लाए थे और इसकी सप्लाई कहां की जानी थी। प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि यह गिरोह लंबे समय से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर सक्रिय हो सकता है।
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क्यों होती है 'खैर' की लकड़ी की तस्करी? (Why is Khair Wood Smuggled?)

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इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर खैर की लकड़ी की तस्करी क्यों नहीं रुक रही है? (Internal link to related article: खैर की लकड़ी का काला कारोबार)
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खैर, जिसका वैज्ञानिक नाम Acacia catechu है, एक बहुमूल्य वृक्ष है। इसका सबसे अधिक उपयोग 'कत्था' (Kattha) बनाने में किया जाता है, जो पान मसाले और औषधियों में प्रयोग होता है। बाजार में कत्थे की भारी मांग और ऊंची कीमतों के कारण खैर की लकड़ी की कीमत लाखों में होती है।
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    कत्था उद्योग: खैर के पेड़ की छाल और लकड़ी के अंदरूनी हिस्से (Heartwood) को उबालकर कत्था तैयार किया जाता है। पान, गुटखा और मसाला उद्योग में इसकी खपत बहुत ज्यादा है।
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    औषधीय गुण: आयुर्वेद में खैर का उपयोग रक्त शोधक और त्वचा रोगों के उपचार में किया जाता है, जिससे इसकी मांग दवा कंपनियों में भी रहती है।
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    मजबूती: खैर की लकड़ी बेहद मजबूत होती है और यह पानी में जल्दी खराब नहीं होती, इसलिए इसका उपयोग फर्नीचर और औजारों के हत्थे बनाने में भी किया जाता है।
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यही कारण है कि तस्कर रातों-रात अमीर बनने के लिए जंगलों का विनाश कर रहे हैं। बिजनौर का तराई क्षेत्र, जहां खैर के घने जंगल हैं, इन तस्करों के लिए एक सॉफ्ट टारगेट बन जाता है।
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हरेवली गंगा बैराज: तस्करी का संवेदनशील रूट

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घटनास्थल यानी हरेवली गंगा बैराज, भौगोलिक दृष्टि से तस्करों के लिए एक रणनीतिक रास्ता माना जाता है। यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमाओं को जोड़ता है और यहां से निकलकर तस्कर आसानी से दूसरे जिलों जैसे मुजफ्फरनगर, मेरठ या रामपुर की ओर भाग सकते हैं।
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साहूवाला रेंज के अधिकारी अक्सर इस क्षेत्र में गश्त बढ़ाते हैं, लेकिन घने कोहरे और रात के अंधेरे का फायदा उठाकर तस्कर अपनी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। इस बार वन विभाग की सटीक सूचना तंत्र (Intelligence Network) ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया।
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वन विभाग की चुनौती और कानूनी कार्रवाई

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पकड़े गए आरोपी के खिलाफ भारतीय वन अधिनियम (Indian Forest Act, 1927) की सुसंगत धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया जा रहा है। वन दरोगा साजिद मलिक ने स्पष्ट किया है कि वन संपदा को नुकसान पहुंचाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
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आमतौर पर ऐसी घटनाओं में निम्नलिखित धाराओं का उपयोग किया जा सकता है:
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    धारा 41 और 42: वन उपज के पारगमन (Transit) के नियमों का उल्लंघन।
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    धारा 52: वन अपराध में शामिल वाहन और उपकरणों की जब्ती।
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    धारा 26: आरक्षित वन में अवैध प्रवेश और पेड़ों की कटाई।
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वन विभाग अब यह जांच कर रहा है कि क्या इस तस्करी में कोई स्थानीय व्यक्ति भी शामिल था जिसने जंगल के रास्तों की जानकारी दी हो। जब्त की गई पिकअप और लकड़ी को वन परिसर में सुरक्षित खड़ा कर दिया गया है और लकड़ी की मापतौल कर उसकी बाजार कीमत का आकलन किया जा रहा है।
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बिजनौर में बढ़ता वन अपराध और रोकथाम

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बिजनौर जिले में वन विभाग पिछले कुछ महीनों से काफी सक्रिय है। इससे पहले भी नजीबाबाद और बढ़ापुर क्षेत्र में अवैध लकड़ी से लदी ट्रैक्टर-ट्रॉलियां पकड़ी गई हैं।
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विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पकड़-धकड़ काफी नहीं है। तस्करी को जड़ से खत्म करने के लिए उन कारखानों और गोदामों पर भी छापेमारी जरूरी है जहां यह चोरी की लकड़ी खपायी जाती है। अक्सर देखा गया है कि रामपुर, सहारनपुर और आसपास के जिलों में चल रही अवैध कत्था भटठियां इस तस्करी का मुख्य कारण हैं।
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साजिद मलिक और उनकी टीम की इस कार्रवाई की स्थानीय स्तर पर सराहना हो रही है। जंगल बचाने के लिए वन रक्षकों को अक्सर जान जोखिम में डालनी पड़ती है, क्योंकि तस्कर कई बार हथियारबंद होते हैं और हमला करने से भी नहीं चूकते।
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बिजनौर के साहूवाला रेंज में खैर की लकड़ी से भरी पिकअप का पकड़ा जाना वन विभाग की सतर्कता का प्रमाण है। वन दरोगा साजिद मलिक और उनकी टीम ने न केवल सरकारी संपत्ति की चोरी रोकी है, बल्कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले माफियाओं को कड़ा संदेश भी दिया है। हालांकि, एक आरोपी का फरार होना चिंता का विषय है, और पुलिस तथा वन विभाग को संयुक्त रूप से उसकी तलाश करनी होगी।
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आने वाले दिनों में देखना होगा कि पकड़े गए चालक से पूछताछ में और क्या बड़े खुलासे होते हैं। क्या यह किसी बड़े सिंडिकेट का हिस्सा है? बहरहाल, वन विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि जंगलों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
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