सोमवार का दिन बिजनौर के प्रशासनिक गलियारों में हलचल भरा रहा। कलेक्ट्रेट सभागार में जब जिला पोषण समिति (District Nutrition Committee) की बैठक शुरू हुई, तो माहौल सामान्य बैठकों जैसा नहीं था। जिलाधिकारी (DM) जसजीत कौर के तेवर स्पष्ट बता रहे थे कि वह जिले के नौनिहालों के स्वास्थ्य के मामले में रत्ती भर भी लापरवाही बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं।
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डीएम ने स्वास्थ्य विभाग, बाल विकास विभाग (ICDS) और पंचायती राज विभाग के अधिकारियों के साथ मैराथन बैठक की और स्पष्ट कर दिया कि "कुपोषण मुक्त बिजनौर" (Malnutrition Free Bijnor) अब महज एक नारा नहीं, बल्कि प्रशासन का सबसे अहम एजेंडा होगा। उन्होंने अधिकारियों को प्रशासनिक अधिकारी से ज्यादा एक 'संवेदनशील नागरिक' की भूमिका निभाने की नसीहत दी।
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इस विस्तृत रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि डीएम की इस बैठक के क्या मायने हैं, जमीनी स्तर पर क्या बदलाव आने वाले हैं और कुपोषण के खिलाफ इस जंग में प्रशासन का 'ब्लूप्रिंट' क्या है।
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1. डीएम की नसीहत: 'सरकारी नौकरी नहीं, यह सामाजिक धर्म है'

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बैठक की शुरुआत ही डीएम जसजीत कौर ने एक भावनात्मक और कड़े संदेश के साथ की। उन्होंने सभागार में मौजूद सभी वरिष्ठ अधिकारियों की आंखों में देखते हुए कहा कि कुपोषण के खिलाफ लड़ाई को सुबह 10 से शाम 5 बजे तक की 'सरकारी ड्यूटी' न समझा जाए।
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डीएम ने कहा, "जिले का कोई भी बच्चा अगर कुपोषित है, तो यह हम सबके लिए चिंता का विषय होना चाहिए। अधिकारियों को आपसी समन्वय (Coordination) से काम करना होगा। विभागों के बीच की दीवारें गिराकर एक टीम की तरह काम करें। यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं है, बल्कि यह हमारी सामाजिक जिम्मेदारी (Social Responsibility) है कि हम आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ और सबल बनाएं।"
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उनका यह बयान इशारा था कि आंगनबाड़ी कार्यकत्री से लेकर जिला स्तर के अधिकारी तक, सबको अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। अक्सर देखा जाता है कि विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालते हैं, जिसे लेकर डीएम ने सख्त चेतावनी दी है।
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2. 'रेड जोन' वाले बच्चों पर तीसरी आंख का पहरा

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बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु बच्चों की स्वास्थ्य निगरानी (Health Monitoring) रहा। डीएम ने स्पष्ट किया कि आंकड़ों की बाजीगरी से कुपोषण नहीं मिटेगा।
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    वजन की सटीक निगरानी: डीएम ने निर्देश दिए कि आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों का वजन (Weight Measurement) पूरी ईमानदारी से किया जाए। अक्सर यह शिकायतें आती हैं कि बिना वजन किए ही रजिस्टर भर दिए जाते हैं। अब ऐसा नहीं चलेगा।
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    सैम और मैम बच्चे: जो बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित (SAM - Severe Acute Malnutrition) और मध्यम कुपोषित (MAM) श्रेणी में हैं, उनकी सूची अलग से तैयार की जाए।
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    ट्रैकिंग: डीएम ने कहा कि ऐसे बच्चों की हर हफ्ते निगरानी होनी चाहिए। उन्हें क्या दवा दी गई, उन्हें अतिरिक्त पोषाहार मिला या नहीं, और उनके स्वास्थ्य में कितना सुधार हुआ—इसका पूरा रिकॉर्ड 'पोषण ट्रैकर ऐप' और रजिस्टर दोनों में अपडेट रहना चाहिए।
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3. राशन की गुणवत्ता: 'अगर खाना खराब, तो अफसर जवाबदेह'

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कुपोषण से लड़ने में सबसे बड़ा हथियार है- पौष्टिक आहार। सरकार द्वारा आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और बच्चों को दाल, दलिया, तेल और अब 'हॉट कुक्ड मील' (Hot Cooked Meal) जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं। लेकिन अक्सर इसकी गुणवत्ता (Quality) पर सवाल उठते रहते हैं।
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इस मुद्दे पर डीएम जसजीत कौर ने 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई है। उन्होंने जिला कार्यक्रम अधिकारी (DPO) और खाद्य विभाग को निर्देश दिए:
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    सैंपलिंग: बांटे जा रहे राशन की रैंडम सैंपलिंग कराई जाए।
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    क्वालिटी चेक: अगर किसी भी केंद्र पर सड़ा-गला या निम्न गुणवत्ता का राशन मिलता पाया गया, तो संबंधित एजेंसी और वितरण करने वाले जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
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    फीडबैक: लाभार्थियों से सीधा संवाद कर पूछा जाए कि उन्हें राशन समय पर और पूरा मिल रहा है या नहीं।
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4. समन्वय का मंत्र: जब मिलेंगे तीन विभाग, तभी बनेगा काम

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कुपोषण सिर्फ खाना खिलाने से दूर नहीं होता, इसके लिए साफ-सफाई और चिकित्सा भी जरूरी है। डीएम ने बैठक में 'कन्वर्जेंस' (Convergence) पर जोर दिया।
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    स्वास्थ्य विभाग: एनीमिक (खून की कमी वाली) महिलाओं और बच्चों की जांच समय पर करें और आयरन की गोलियां उपलब्ध कराएं।
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    पंचायती राज विभाग: गांवों में साफ-सफाई और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित करे, क्योंकि गंदगी से होने वाले रोग (जैसे डायरिया) कुपोषण का बड़ा कारण हैं।
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    ICDS: बच्चों की पहचान और पोषाहार वितरण की रीढ़ बने।
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डीएम ने मुख्य विकास अधिकारी (CDO) रणविजय सिंह को निर्देश दिया कि वे खुद समय-समय पर इन विभागों के संयुक्त कार्यों की समीक्षा करें।
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5. कागजों से बाहर निकलें योजनाएं: 'धरातल पर दिखना चाहिए असर'

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बैठक के अंत में डीएम जसजीत कौर ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही, जो उनकी कार्यशैली को दर्शाती है। उन्होंने कहा, "योजनाओं को अमली जामा पहनाया जाए। लखनऊ से जो योजनाएं चलती हैं, वे फाइलों में तो बहुत अच्छी लगती हैं, लेकिन उनका असली मकसद तब पूरा होगा जब वे धरातल पर दिखाई देंगी।"
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उन्होंने कहा कि अगर कोई अधिकारी यह सोचता है कि एसी कमरे में बैठकर रिपोर्ट भेजने से काम चल जाएगा, तो वह गलतफहमी में है। अधिकारियों को फील्ड में उतरना होगा। गांव-गांव जाना होगा और देखना होगा कि क्या वाकई कुपोषित बच्चे को इलाज मिल रहा है? क्या वाकई गर्भवती महिला को पोषण किट मिल रही है?
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6. बैठक में ये दिग्गज रहे मौजूद

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जिलाधिकारी की अध्यक्षता में हुई इस हाई-प्रोफाइल बैठक में जिले के सभी प्रमुख अधिकारी मौजूद रहे, जिससे मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
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    रणविजय सिंह (मुख्य विकास अधिकारी - CDO): इन्होंने आश्वस्त किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में विकास और पोषण को एक साथ जोड़कर अभियान चलाया जाएगा।
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    शीतल वर्मा (जिला कार्यक्रम अधिकारी - DPO): जिनके कंधों पर ICDS विभाग और आंगनबाड़ी केंद्रों की सीधी जिम्मेदारी है।
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    लक्ष्मी देवी (जिला अर्थ एवं संख्या अधिकारी): जो आंकड़ों की निगरानी और प्रगति रिपोर्ट पर नजर रखेंगी।
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इसके अलावा सीएमओ कार्यालय के प्रतिनिधि, बेसिक शिक्षा विभाग और आपूर्ति विभाग के अधिकारी भी बैठक में उपस्थित रहे।
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खबरीलाल विश्लेषण: क्यों महत्वपूर्ण है यह बैठक?

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बिजनौर जनपद के कुछ ग्रामीण और खादर इलाके कुपोषण के लिहाज से संवेदनशील माने जाते हैं। डीएम जसजीत कौर की यह सक्रियता बताती है कि प्रशासन अब सुस्त रवैया छोड़कर 'प्रो-एक्टिव' मोड में आ गया है।
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आगे क्या? आने वाले दिनों में हम उम्मीद कर सकते हैं कि बिजनौर के आंगनबाड़ी केंद्रों पर छापेमारी बढ़ सकती है। वजन मशीनों की धूल झाड़ी जाएगी और राशन वितरण में पारदर्शिता आएगी। डीएम के कड़े निर्देशों के बाद लापरवाह कर्मचारियों में हड़कंप मचना तय है।
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जनता से अपील: 'खबरीलाल' अपने पाठकों से भी अपील करता है कि अगर आपके आसपास कोई कुपोषित बच्चा है या आंगनबाड़ी केंद्र पर अनियमितता हो रही है, तो उसकी शिकायत जरूर करें। जैसा कि डीएम साहिबा ने कहा- यह हम सबकी 'सामाजिक जिम्मेदारी' है।
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रिपोर्टिंग: अनिल कुमार शर्मा, खबरीलाल विशेष संवाददाता स्थान: धामपुर, बिजनौर (यूपी) तारीख: 30 दिसंबर 2025
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